Saturday, October 30, 2010

ब्‍लू लाइन दिल्‍ली की असली लाईफ लाइन

किलर लाईन, नीला प्रेत, मौत की लाईन और न जाने कितने ही ऐसे नामो से ब्‍लू लाईन को मीडिया ने प्रचारित कर लोगों के मन में ऐसा भय पैदा किया कि वे भी उसे इन्‍हीं नामो से सम्‍बोधित करने लगे और इस धुर्त मीडिया की तोता रटन को ही सच मान कर इन बसो को बंद करवाने के लिए उतावले होने लगे। पर ये बेवकूफ लोग इनको क्‍या कहें ना तो इनको अपने अच्‍छे का पता है और न अपने बूरे का केवल पता है तो सिर्फ इतना की मीडिया ने जो कहा वो ही सच है। तो मान लो कि ये बसे केवल जान लेती हैं। सामने आते ही किसी को भी रौंद देती हैं। ये तो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। अगर ये इसी प्रकार चलती रही तो हमको भी मार देंगी। तो मिला दी इस धुर्त मीडिया की तान में तान और लगवा दिया इन बसों में ताला।

आखिर ये माजरा क्‍या है। आइए आपको बताते हैं, इन ब्‍लू लाईन बसों को 1980 के आरम्भ में दिल्‍ली की सड़को पर उतारा गया था। दिल्ली में उस दौरान डीटीसी बसों की हड़ताल के परिणामस्वरूप इन बसो को चलाया गया था जिसके कारण दिल्ली की गति थम गई थी। उस समय इनका रंग लाल था। इन बसो को चलाने से दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन में बहुत सुधार हुआ। और वर्तमान समय में ये दिल्‍ली की असली लाईफ लाईन बन चुकी हैं। और खासकर उस आम आदमी की सबसे ज्‍यादा जरूरत जिसके नाम पर हर पांच साल बाद ये राजनीति की रोटी सेकने वाले वोट मांगने उसकी चौखट पर जाते हैं और चुनाव समाप्‍त होने के बाद उस आम आदमी को भूल जाते हैं। जिनके पास दो वक्‍त की रोटी का जुगाड़ करने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं होता।

आम आदमी मोटी-मोटी रकम देकर आटो या टैक्‍सी में सफर नहीं कर सकता। जिनकी जान का वास्‍ता देकर इन बसों को बंद किया गया है। आज वह आम आदमी ही सबसे ज्‍यादा इन बसों के सड़कों पर न उतरने से परेशान हो रहा है। घंटों बस स्‍टॉप पर खड़े होने के बाद भी इन डीटीसी बसों का कोई माई-बाप नहीं है। कब ये बसे आती हैं और कब नहीं। आती भी हैं तो उनकी हालत देखकर इस आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं। कि आखिर इसमें चढे़ की ना चढ़े परन्‍तु पूरे दिन का थका मांदा वो हिम्‍मत करके सांस रोक कर अपनी जिंदगी को हाथ में रखकर उस पर चढ़ जाता है। उसके बाद भगवान ही उसका मालिक होता है।

जिस मैट्रो का नाम और भरोसे को लेकर इन बसो को सड़कों से हटाया गया है। आज उसकी हालत खुद खस्‍ता हो चुकी है। किस स्‍टेशन पर कितनी देर रूकेगी अथवा बीच रास्‍ते में कभी भी किसी भी जगह रूक जाती है। जिसके चलते हजारो लोगों की जान पर आ बनती हैं। अव्‍यवस्‍था का आलम यह है कि किसी-किसी स्‍टेशन पर तो सूचना देने के लिए कोई अधिकारी भी नहीं होता। मैट्रो वाले केवल तकनीकी खराबी बताकर अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं। इस अव्‍यवस्‍था का नजारा कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के दौरान भी लोगों को खूब देखने को मिला। जब जहां तहां कहीं भी ये मैट्रो बीच टनल में रूक गई। दो ढाई मिनट में मैट्रों की फ्रिक्‍वंसी देने का वादा करने करने वाली ये डीएमआरसी आज कई स्‍टेशनों पर 15 से 20 मिनट में भी सेवा उपलब्‍ध नहीं करवा पा रही है। जिसके चलते स्‍टेशनों पर भारी भीड़ हो जाती है जिसको कंट्रोल करने के लिए उसके पास कोई व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध नहीं है। जिसके चलते लोग धक्‍का-मुक्‍की पर उतारू हो जाते हैं। और ये धक्‍का-मुक्‍की कई बार लड़ाई झगड़ों में भी बदल जाती है। गाली-गलोच होना तो आम बात हो गई है। और इन सबमें सबसे ज्‍यादा परेशानी महिलाओं बच्‍चों और विकलांग व्‍यक्तियों को होती है जो कि इन सबसे टक्‍कर नहीं ले पाते। मैट्रो स्‍टेशनों पर एकत्रित बेतहाशा भीड़ को देखकर डीएमआरसी वालों के भी पसीने छूट जाते हैं। और कितनी ही बार उनको ये अनाउंसमेंट करनी पड़ती है‍ कि यदि यात्रियों को अधिक जल्‍दी है तो वे किसी दूसरे विकल्‍प का प्रयोग करें। इतना महंगा किराया देने के बाद भी आम लोगों को केवल असुविधा ही मिल रही है।

और रही बात इस भोपू मीडिया की तो उसके लिए तो इसमें भी अपनी टीआरपी बढ़ाने की होड़ लगी रहती है। ब्‍लू लाईन को निपटाने के प्रयास में सफल होने के बाद अब मैट्रो को भी गाली देने से पीछे नहीं हटते। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसकी हैडिंग होती है एक बार फिर परेशानी का सबब बनी मैट्रो, फिर थमी दिल्‍ली की लाईफ लाईन आदि। लेकिन इसमें गलती इस मीडिया की नहीं है। उनके लिए तो केवल यह व्‍यवसाय है। इनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की किसकी लाईफ लाईन रूकी या चली।

मुझे तो इसमें भी इस सरकार की किसी बड़ी कम्‍पनी से सांठगांठ की बू आ रही है। इतने लोगों के पेट पर लात मारने के पीछे किसी बड़ी कम्‍पनी के साथ कोई अंदरूनी गठबंधन हो सकता है। ये तो आने वाले समय में ही साफ हो सकेगा। क्‍योंकि ये सरकार एक जगह जहां धीरे-धीरे करके सभी सरकारी महकमों का नीजीकरण करने पर उतारू है वहीं दूसरी तरफ लोगों की जिंदगी से उसको इतनी हमदर्दी कहां से हो गई कि एक ही झटके में सारी व्‍यवस्‍था अपने हाथों में ले ली है। इस सरकार की ईमानदारी से हम अच्‍छी तरह से वाकिफ हैं। किस तरह पहले बिजली का नीजिकरण करके आज आम जनता को रिलायंस कम्‍पनी के साथ मिलकर जिस तरह से लूटा जा रहा है। उसके बाद जल बोर्ड का भी निजीकरण करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। अब डीटीसी की आड़ लेकर किसी कम्‍पनी के साथ करार किया है। ये जानने की बात है। वो भी आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

इसके पूर्व हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि जब मामला पहले से ही कोर्ट में है तो बिना कोर्ट को संज्ञान में रखे हुये नोटिफिकेशन क्यों जारी किया गया। हाईकोर्ट ने शिला सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा कि जब तक यातायात के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जाते तब तक साउथ दिल्ली के सभी रूटों पर ब्लूलाइन बसें बहाल की जाए। दूसरी तरफ, ब्लूलाइन ऑपरेटरों का कहना है कि सरकार ने उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हटने के लिए कहा, तो वे हट गए लेकिन सरकार को भी उनके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक सोचना चाहिए क्योंकि बसें हटने से हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।

Friday, October 15, 2010

क्‍या शाही इमाम के लिए यही धर्मनिरपेक्षता है ?

एक पत्रकार को। पत्रकारों के ही बीच में। एक पत्रकार सम्‍मेलन में इस तरह पीटा गया जैसे किसी राह चलते छुटभैय्ये को दुत्‍कार दिया गया हो। क्‍या अब पत्रकारों की यही गैरत रह गई है कि कोई भी राह चलता इनको या इनकी बिरादरी वालों को दुत्‍कार दे या इन्‍हीं के सामने उसको कुत्‍तों की तरह पीट दे। क्‍या इन्‍हें इसमें भी धर्मनिरपेक्षता नजर आती है। केवल राम का नाम लेने मात्र से कोई मौलाना इस तरह आपे से बाहर हो गया कि उसने अपनी मर्यादा को ताक पर रखकर गली के गुण्‍डे मवाली की तरह एक पत्रकार को सभी पत्रकारों के बीच में अपने साथ लाए गए गुण्‍डों के साथ मिलकर पीट दिया। सारा घटनाक्रम निम्‍न प्रकार है:-

जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैयद अहमद बुखारी ने एक पत्रकार को पीटा व जान से मारने की धमकी दी। जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी अपने कुछ समर्थकों के साथ लखनऊ के गोमती होटल में एक प्रेस कांफ्रेंस को सम्बोधित करने आये थें। कांफ्रेंस के दौरान उर्दू अखबार दास्ताने-ए-अवधके सम्पादक अब्दुल बहीद चिश्ती द्वारा पूछे गये एक प्रश्न पर बुखारी व उनके समर्थक भड़क गये।

पत्रकार द्वारा पूछा गया सवाल

पत्रकार ने बुखारी से प्रश्न पूछा कि अयोध्‍या की विवादित जमीन के सन 1528 के खसरे में राजा दशरथ का नाम आता है चूंकि भगवान राम राजा दशरथ के वारिस हैं इस नाते क्‍या मुसलमानों को उक्‍त जमीन हिन्‍दुओं को नहीं दे देनी चाहिए?

संपादक पर झपटे बुखारी

प्रश्न सुनते ही बुखारी इस कदर भड़क गये कि किसी की परवाह किये बिना चिश्ती को कांग्रेस का एजेंट व गद्दार तक कह डाला। इसके बाद धमकी देते हुए बोले की चुपचाप बैठ जा, बैठ जा छुपकर, नहीं तो वहीं आकर गर्दन नाप दूंगा।

बुखारी ने भड़कते हुए उन्हें गालियां दी और अपने साथियों को उन्हें मारने के लिए कहा। इसके पश्चात पुलिस के रोकने के बावजूद भी बुखारी समेत उनके साथी धक्का देते हुए संपादक को एक किनारे ले गये और उस पर थप्पड़, घुंसे मारने लगे।

लेकिन फिर भी बुखारी का गुस्सा शांत नहीं हुआ उन्होंने अपने साथियों से कहा मारो निकाल बाहर करो इसको। समझता है, हमने चूड़ियां पहनी हुई हैं, जब पत्रकारों ने इस बाबात बुखारी से एक पत्रकार को इस तरह मारने का कारण पूछा तो बुखारी ने बहुत ही अभद्र भाषा में अपशब्‍द कहते हुए पत्रकारों से कहा कि हम मारेंगे भी और निकालेंगे भी, हम एजेंट और मुसलमानों के गद्दारों को बर्दाश्त नहीं कर सकते।

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...