Wednesday, June 8, 2011

आखिर बाबा रामदेव और उनके समर्थकों का गुनाह क्‍या था....

बाबा रामदेव के सत्याग्रह के दौरान 4-5 जून की रात्री में केन्द्र सरकार के इशारे पर जो कुछ हुआ, उसे देश ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों ने देखा। सभी जानना चाहते हैं कि जितने भी लोग बाबा रामदेव के साथ अनशन पर बैठे थे, वे क्या चाहते थे? वे सिर्फ इतना चाहते कि केन्द्र सरकार एक अध्यादेश लाए जिसमें कहा जाए कि “विदेशो जमा कालाधन राष्ट्रीय संपत्ति है और केन्द्र सरकार उसको वापस लाने के लिए वचनबद्ध है।” यह मांग किसी राजनीतिक दल की नहीं है, यह मांग उन करोड़ों भारतीय की है, जो अपने खून पसीने की कमाई को विभिन्न कर के रूप में भारत सरकार को इसलिये देते हैं कि वे जिस देश में रहते हैं, उस देश का समग्र विकास हो, हर हाथ को काम मिले, बच्चों को शिक्षा मिले, गांवों में आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हो, हर खेत को पानी मिले, जिससे यह देश फिर गुलामी के दलदल में नहीं फंसे और भारत स्वाभिमान के साथ फिर से उठ खड़ा हो। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह मांग गलत है? क्या भारत के नागरिकों को चाहे वे करदाता हों या ना हों, उन्हैं यह अधिकार नहीं है कि वे देश के विकास की मांग करें, वे सरकार से स्वच्छ प्रशासन की अपेक्षा करें । वे देश की उस समस्या से मुक्ति की इच्छा भी व्यक्त करें जिससे आम आदमी त्रस्त और परेशान है। क्या यह मांगें राजनीतिक हैं? जो लोग वहां इकटठा हुए थे, वे अपने लिए आरक्षण नहीं मांग रहे थे, ना ही यह कह रहे थे कि भारत में आतंक फैलाने के अपराध में फांसी की सजा पाए अफजल गुरू और मोहम्मद कसाब को तत्काल फांसी दी जाए, ना ही उन्होंने किसी राजनीतिक व्यक्ति का नाम अपने मंच से लिया था और ना ही उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में शामिल मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की थी। तो फिर ऐसा कौनसा कारण था कि केन्द्र सरकार ने पांडाल में सोये हुए लोगों पर आक्रमण बोल दिया, उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े, हवाई फायर किये, मंच को आग लगाकर अफरा तफरी का माहौल बना दिया ? वृद्धों, महिलाओं और बच्चों पर ना केवल लाठियां भांजी अपितु उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार करते हुए घसीट घसीट कर बाहर निकाला। आखिर कैसे हमारे लाचार और बेचारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जिनको यह पता ही नहीं चलता कि उनकी सरकार में कितने मंत्रयिों ने कितना भ्रष्टाचार कर लिया, उनमें अचानक इतनी ताकत आ जाती है कि वे कहने लगे कि इस कार्यवाही के अलावा उनकी सरकार के पास और कोई विकल्प ही नहीं बचा था। भारत के हर नागरिक को प्रधानमंत्री से यह प्रश्न पूछना चाहिये कि वे किनको बचाना चाह रहे हैं? और जो लोग 4-5 जून की रात को पांडाल में थे, क्या उन्होंने दिल्ली के एक भी नागरिक के साथ अभद्रता की थी? पुलिस या प्रशासन के साथ असहयोग किया था? क्या बाबा रामदेव के आव्हान पर भारत भर से जो लोग वहां पर आये थे, वे छंटे हुए गुंडे और बदमाश थे? क्या उनके पास प्राण घातक हथियार थे ? क्या वे स्थानीय नागरिकों के लिए खतरा बन गये थे? यदि ऐसा नहीं था, तो इस बर्बर कार्यवाही का सरकार के पास क्या जवाब है? क्या सरकार यह भूल चुकी है कि 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्री को भारत एक लोकतांत्रकि देश के रूप में दुनिया के सामने आ चुका है। भारत में रहने वाले लोगों के कुछ नागरिक अधिकार भी हैं? जिनकी रक्षा के लिए हर लोकतांत्रकि सरकार जिम्मेदार है? क्या जिस कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिक्षा प्राप्त की है, वहां उन्हें यही सिखाया और पढ़ाया गया था कि निर्दोष नागरिकों और अपने संवैधानिक अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाए। क्या प्रधानमंत्री के जन्मदाताओं ने उनकी हर मांग का जवाब इसी अंदाज में दिया था, जैसा कि उनकी सरकार ने भारत के नागरिकों के साथ किया? प्रश्न बहुत सारे हैं। सवाल यह भी है कि यह सरकार भारत के नागरिकों को किस रूप में देखती है, और जिन मतदाताओं के मतों पर जीतकर सत्ता प्राप्त करती है, उनके साथ किस तरह का व्यवहार करती है। क्यों भारत के राजनेता हर मुद्दे का राजनीतिकरण कर देते हैं? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीतिक दलों का विषय है, इस पर भारत की जनता को बोलने का कोई अधिकार ही नहीं है, जो भ्रष्टाचार से आकंठ पीड़ित है? स्वतंत्र भारत में देश की आजादी के बाद भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आये, परंतु किसी भी सरकार ने कभी भी यह साबित करने की कोशिश नहीं की कि वह किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को लेकर असहनशील है। सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह है कि सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी या सरकार के मंत्रियो ने एक बार भी देश की जनता से अपने कुकृत्य के लिए माफी नहीं मांगी? और बजाय ए राजा, कनीमोझी, सुरेश कलमाडी, सोनिया गांधी, शरद पवार और अजीत चव्हाण से यह पूछने के कि उनकी अकूत संपत्ति कहां से आई है, वे बाबा रामदेव से यह पूछ रहे हैं कि इस सत्याग्रह को करने के लिए पैसा कहां से आ रहा है? और बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को नेपाली नागरिक बताने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि उनकी पार्टी की अध्यक्ष भी भारतीय नहीं है। और जो दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव को महाठग बता रहे हैं, उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र सरकार के ४ मंत्री इस ठग से क्यों बात करने गए थे ? यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि जब से बाबा रामदेव ने सोनिया गांधी और मनमोहन सरकार पर उनको जान से मार डालने के षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया है,और उन्हैं कुछ भी होने के लिए सोनिया गांधी को जिम्मेदार बताया है, तब से पूरी कांग्रेस पार्टी बजाय देश से माफी मांगने के सोनिया गांधी के बचाव में उतर आई है, और कांग्रेस के महामंत्री जनार्दन दिवेदी का यह कहना कि ‘‘सत्याग्रही मौत से बचने के लिए महिलाओं के कपडे पहनकर भागता नहीं है।’’ बाबा रामदेव के इस आरोप को पुष्ट ही करता है कि सरकार ने उनको मारने का षड़यंत्र रचा था। लेकिन सरकार और कांग्रेस को इतिहास को एक बार खंगाल लेना चाहिये। उन्हैं यह याद रखना चाहिये कि भारत के नागरिकों का आत्मबल बहुत मजबूत है। जो भारत 1200 साल की गुलामी सहने के बाद भी अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है। इंदिरा गांधी के कठोर आपातकाल को झेल सकता है, वह सत्ताधीशो की दमनकारी मानसिकता से डरने वाला नहीं है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 जयनारायण व्यास द्वारा आज से 60 साल पहले लिखी गई यह कविता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा और चेतावनी हैं जो नागरिकों को सम्मान की निगाह से नहीं देखते।

‘‘ भूखे की सूखी हडडी से,
वज्र बनेगा महाभयंकर,
ऋषि दधिची को इर्ष्या होगी,
नेत्र तीसरा खोलेंगे शंकर,
जी भर आज सता ले मुझको,
आज तुझे पूरी आजादी,
पर तेरे इन कर्मो में छिपकर,
बैठी है तेरी बरबादी,
कल ही तुझ पर गाज गिरेगा,
महल गिरेगा, राज गिरेगा,
नहीं रहेगी सत्ता तेरी,
बस्ती तो आबाद रहेगी,
जालिम तेरे इन जुल्मों की,
उनमें कायम याद रहेगी।
अन्न नहीं है, वस्त्र नहीं है,
और नहीं है हिम्मत भारी,
पर मेरे इस अधमुए तन में
दबी हुई है इक चिंगारी
जिस दिन प्रकटेगी चिंगारी
जल जायेगी दुनिया सारी
नहीं रहेगी सत्ता तेरी,
बस्ती तो आबाद रहेगी,
जालिम तेरे इन जुल्मों की,
उनमें कायम याद रहेगी।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)

Tuesday, June 7, 2011

बाबा रामदेव को मिल रहा है देशभर में जबर्दस्‍त जनसमर्थन

बाबा रामदेव को देशभर में जबर्दस्‍त जनसमर्थन मिल रहा है। और कांग्रेस की जबर्दस्‍त छिछालेदर हो रही है। आखिर कर्म ही ऐसा किया है। आधी रात को निरीह लोगों पर सरकारी गुण्‍डे भेजकर जो काम डैकत करते हैं। ठीक वैसा ही कृत्‍य किया है। चलो अच्‍छा ही है। अब लोगों को ईमानदार और बेईमान लोगों की पहचान करने में अ‍सुविधा नहीं होगी। और हां एक बात और अब लोगों को पता चल गया की जब भी कभी देशहीत की बात सामने आयेगी तो राष्‍ट्रीयस्‍वयंसेवक संघ को लोग जरूर याद करेंगे और देशद्राही कांग्रेसी चहरे पर से अब पर्दा उतर गया है। और लोगों को स्‍वयं पता चल गया है कि इस देश का हित कौन चाहता है और इसका अहित कौन करना चाहता है।




Saturday, May 28, 2011

मत भूलो क्रांतिवीरों को

मत भूलो क्रांतिवीरों को


वीर स्वातंत्र्य सावरकर जयंती 27 मई


जो जाति अपने अतित को भूल जाती है, उसका विनाश निश्चित है। और वर्तमान परिवेश में हिन्‍दुओं की स्थिति देखकर यही प्रतीत होता है कि ये अपने अतीत को भूलकर विनाश की तरफ अग्रसर हो रही है। अपने अतीत के किसी भी प्रसंग पर गौरवान्वित होना तो दूर उल्‍टे ये उसे उपहास का विषय मानकर उसकी घोर निंदा और घृणा करने लगे हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है कि अब ये हिन्‍दू और ये हिन्‍दुस्‍तान अपने नष्‍ट होने के कगार पर पहुंच रहा है। आज किसी नौजवान से पूछा तो उसका आदर्श कौन है तो वह सलमान, शाहरूख और सचिन को बताएगा कोई पूछे जरा इनसे की इन लोगों ने कौन सा महानता का कार्य किया जिससे हमारे देश का कुछ भला हुआ हो। खैर समय ही ऐसा आ गया है किसी को नसीहत भी नहीं दे सकते। क्‍योंकि किसीको इसकी जरूरत ही नहीं है सब आजकल बहुत समझदार हैं। निम्‍नलिखित पंजाब केसरी की संपादकी आज के समय में बहुत प्रासंगिक है आशा है आप लोगों को भी इसे पढ़कर कुछ प्रेरणा मिलेगी:-


''पूछेगा इतिहास] समझ लो दिल्ली वालो

क्लीब बने, मुंह आज ढांप कर सोने वालो

कर न सकेगी क्षमा, तुम्हें पीढ़ी आगामी

मिट न सकेगा दाग, नपुंसकता अनुगामी।^^

आज वीर सावरकर की जयंती है। बर्गर और पिज्जा खाने वाली नई पीढ़ी शायद ही वीर सावरकर के बारे में जानती हो। दूरदर्शन या अन्य टीवी चौनल भूल कर भी उनके नाम या उनकी महत्ता का बखान नहीं करते। इसके लिए व्यवस्था जितनी दोषी है उतने ही हम भी हैं। हमने अपने बच्चों को वीर सावरकर के बारे में कभी बताने का प्रयास ही नहीं किया। आज कुछ लोग वीर सावरकर के चित्र पर माल्यार्पण कर इतिश्री कर लेंगे या हिन्दू महासभा में पदों के लिए एक-दूसरे से भिड़ रहे लोग उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लें लेकिन यह इस राष्ट्र की विडम्बना है कि जिन लोगों ने सब सुविधाओं के साथ विशेष श्रेणियों में जेल यात्राएं कीं वे विश्व प्रसिद्ध नेता बन गए। परन्तु जिन्होंने अंडमान जेल की काल कोठरियों में अमानुषिक अत्याचार सहे, बैलों की जगह जुत कर कोल्हू चलाए वे राष्ट्र विरोधी और साम्प्रदायिक कहलाए। वीर सावरकर ब्रिटिश की मांद में जा धमके, उससे निर्भीकता से जा भिड़े, जिनके आग्नेय प्रवाह से परिपूर्ण भाषणों से अंग्रेज भयभीत हुआ उस सावरकर को ब्रिटिश सत्ता भक्त साबित करने और चरित्र हनन करने में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदारों और बुद्धिजीवियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इतिहास साक्षी है कि अंडमान की काल कोठरी में यम-यातनाएं झेलने वाले इस महामानव की काया भले ही जर्जर हो गई हो उनके दृढ़ संकल्प पर कोई आंच नहीं आई थी।

देशभक्त क्रांतिकारियों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 में जो सशस्त्र क्रांति की थी उसे अंग्रेजों ने गदर बताकर देशभक्त भारतीयों को भ्रमित करने की जो कुचेष्ठा की थी उसी भ्रम को तोडऩे के लिए वीर विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटेन में बैठकर 1857 का स्वतंत्रता संग्राम नाम का क्रांतिग्रंथ लिखा जिससे डरे हुए अंग्रेज ने छपने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। वीर सावरकर ने यह ग्रंथ 1907 में लिखा था। प्रतिबंध के बाद भी इसका अंग्रेजी अनुवाद हालैंड में छपा वहां से फ्रांस और भारत में भेजा गया। क्रांतिकारियों ने इसे गीता की तरह पढ़ा। इसका दूसरा संस्करण भीकाजी कामा, लाला हरदयाल आदि क्रांति वीरों ने छपवाया। तीसरा संस्करण सरदार भगत सिंह ने गुप्त रूप में छपवाया। यह ग्रंथ इतना लोकप्रिय था कि इसकी एक-एक प्रति तीन-तीन सौ रुपए में बिकी।

13 मार्च, 1910 को लंदन में विक्टोरिया स्टेशन पर वीर सावरकर को बंदी बना लिया गया। उनके बड़े भाई गणेश सावरकर को 1908 में देशभक्ति की कविता लिखने के कारण 9 जून, 1909 को आजीवन कारावास की सजा देकर काला पानी भेजा गया। छोटे भाई नारायण सावरकर को क्रांतिकारियों का साथी बताकर जेल में बंद कर दिया। जब इस घटना का जेल में बंद वीर सावरकर को पता लगा तब गर्व से बोले, ''इससे बड़ी गौरव की क्या बात होगी हम तीनों भाई भारत माता की आजादी के लिए तत्पर हैं।''

1 जुलाई, 1910 को ब्रिटेन से भारत लाने के लिए वीर सावरकर को समुद्री जहाज से कठोर पहरे के बीच अंग्रेज पुलिस लेकर चल पड़ी। 8 जुलाई, 1910 को वीर सावरकर स्वतंत्र भारत की जय बोल कर समुद्र में कूद पड़े। अंग्रेजों ने खूब गोलियां चलाईं पर निर्भय सावरकर फ्रांस की सीमा में पहुंच गए। फ्रांस की भूमि से सावरकर को गिरफ्तार किया तो इसका विरोध हुआ तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में केस चला पर फ्रांस और ब्रिटेन की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला। 30 जनवरी, 1911 को वीर जी को दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई तब वे हंस कर बोले चलो ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया।

उन्होंने भारत को हिन्द शब्द की परिभाषा दी। वीर सावरकर का सारा जीवन हिन्दुत्व को समर्पित था। अपनी पुस्तक हिन्दुत्व में हिन्दू कौन है? इसकी परिभाषा में यह श्लोक लिखा-

''आसिन्धु सिन्धुपर्यन्तायस्य भारतभूमिका।

पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।''

अर्थात् भारत भूमि के तीनों ओर के सिन्धुओं (समुद्रों) से लेकर हिमालय के शिखर से जहां से सिंधु नदी निकलती है वहां तक की भूमि जो पितृ (पूर्वजों) की भूमि है यानी जिनके पूर्वज भी इसी भूमि में पैदा हुए और जिसकी पुण्य भूमि यानी तीर्थ स्थान इसी भूमि में हैं वही हिन्दू होता है।

आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास में यथोचित स्थान ही नहीं दिया। स्वतंत्रता संग्राम में केवल गांधी और गांधीवादियों की ही भूमिका का विस्तृत उल्लेख किया। पंडित नेहरू तो इनसे इतने भयभीत थे कि देश का हिन्दू सावरकर को ही अपना नेता मान बैठेगा। गांधी जी की हत्या के मामले में नेहरू सरकार ने झूठे आरोप लगाकर उन्हें लालकिले में बंद कर दिया। बाद में न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया था।

वीर सावरकर के महाप्रयाण के बाद भी अटल सरकार के दौरान कांग्रेस ने संसद भवन में उनका चित्र लगाने पर विवाद खड़ा कर दिया था और 2001 में यूपीए सरकार के रहते मणिशंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गांधी के नाम का पत्थर लगा दिया था, जबकि गांधी वहां कभी गए ही नहीं थे। मेरे इस सम्पादकीय का प्रयोजन गांधी-नेहरू की आलोचना करना नहीं। उन्होंने अपने प्रकार से देश सेवा का ही उपक्रम किया है, लेकिन मेरी कलम यही कह रही है कि आजादी केवल गांधीवादियों की देन नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदानों के चलते ही मिली है। राष्ट्र सभी को समान सम्मान दे। कांग्रेस ने बहुत से कुटिल खेल खेले हैं, आज राष्ट्र को वीर सावरकर जैसे नेता की जरूरत है। अगर आज हमने बच्चों को वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों को इतिहास नहीं पढ़ाया तो भविष्य में कोई भी क्रांतिवीर नहीं होंगे।

स्रोत:- संपादकीय पंजाब केसरी

Tuesday, April 19, 2011

पाक में जबरन हिन्‍दुओं का धर्म परिवर्तन

स्रोत:- जागरण 19 अप्रैल, 2011

क्‍या इस समाचार के बाद कोई एक भी भारत का मानवाधिकार संगठन पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं पर हो रहे अत्‍याचारों पर एक शब्‍द भी बोलने की हिम्‍मत करेगा। कुछ दिनों पहले कोई एक बिनायक सेन के मानवाधिकारों को लेकर मीडिया से लेकर सड़क तक पर और विदेशों के नोबेल पुरस्‍कार विजेताओं की फौज खड़ी करने वाले तथाकथित अपने को धर्मनिरपेक्षता को सबसे बड़ा पेरोकार साबित करने वाले संगठनों में हौड लगी हुई थी। और ऐसा प्रचारित करने का प्रयास किया जा रहा था। जैसा कि अब भारत में लोकतंत्र नहीं, तानाशाही शासन व्‍यवस्‍था आ गई हो। परन्‍तु उस हिसाब से तो पाकिस्‍तान को हम किस श्रेष्‍णी में रखें। जहां, केवल हिन्‍दू होना ही कोई अपराध हो और उसे हीन द़ष्टि से देखा जाता है। और तरह-तरह के अत्‍याचार किये जाते हैं और जबरदस्‍ती इस्‍लाम कबूल करवाया जाता है। मैं पूछना चाहता हूं, उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों से क्‍या हिन्‍दू को जीने का अधिकार भी नहीं है। इस्‍लाम को शांति का मजहब घोषित करने वालों की बहुत तकरीरे होती हैं। तो मैं उनसे भी पूछना चाहूंगा कि क्‍या इसी प्रकार की शांति की बात करते हैं।

Saturday, April 16, 2011

पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं, सिखों की स्थिति दयनीय

अब हमारे देश के तथाकथित अल्‍पसंख्‍यकों के मानवाधिकार का दुखडा रोने वाले लोग और संगठन इनके बारे में क्‍या कहेंगे। क्‍या इसमें भी किसी हिन्‍दू संगठनों का हाथ है।

साभार:- पंजाब केसरी 16 अप्रैल, 2011


यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...