Tuesday, November 8, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?भाग- (5)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(5)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 05-11-2011

देश बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा है। अगर जल्द सही दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो राजनीतिक पार्टियां वोट के लालच में सामाजिक ढांचे की जड़ों में इतना जहर घोल देंगी कि सभ्‍य व धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। देश के स्वतंत्र होने के बाद यह आवश्यक था कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की जाए। संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया था कि सरकार को प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करनी चाहिए,लेकिन जब भी कभी समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रश्‍न खड़ा होता है मुस्लिम और ईसाई वोटों के लालची कांग्रेस व अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल स्वर में स्वर मिला कर इसका विरोध करना शुरू कर देते हैं।

13 जुलाई, 2003 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि यह अत्यंत दु:ख की बात है कि स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत आने वाले अनुच्छेद 44 पर अमल नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए संसद को कानून बनाना चाहिए क्‍योंकि इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण निर्णय आते ही आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कट्टरपंथियों ने शोर-शराबा मचाना शुरू कर दिया। सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि कांग्रेस और कम्‍युनिस्ट पार्टियों और अन्य दलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध किया।

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका उल्लेख होते ही राजनीतिक क्षेत्र में भूचाल आ जाता है। देश के लिए चाहे वे कितने ही अधिक महत्वपूर्ण हों परन्तु राजनीतिक क्षेत्र के लोग अपने सत्ता स्वार्थ के कारण उनकी निरंतर उपेक्षा करते आ रहे हैं। उन्हीं में से एक मुद्दा है समान नागरिक संहिता का, जिसका नाम लेना भी भारतीय राजनीति में अपराध समझा जाने लगा है परन्तु भारतीय संविधान एवं न्यायपालिका समान नागरिक संहिता को देश की एकता एवं अखंडता के लिए आवश्यक समझती है। ऐसी परिस्थिति में जब संवैधानिक उत्तरदायित्व एवं न्यायालय का निर्णय राजनीतिज्ञों की दृष्टि में अपराध बन जाए तब देश के नागरिकों को इसके विषय में जानना एवं निर्णय लेना अनिवार्य हो जाता है। अत: इस दृष्टि से निम्‍न बिन्दुओं पर विचार करना आवश्यक है।

दुनिया के किसी भी अन्य देश में दोहरी कानून व्यवस्था नहीं तथा भारत के अतिरिक्त किसी भी दूसरे देश के नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून का विधान भी नहीं। यूरोप एवं अमरीका समेत सभी पश्चिमी राष्ट्रों में वहां रहने वाले नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता है। वहां पंथ, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी विशेष कानून का विधान नहीं किया गया। दूसरी तरफ अरब के उन मुस्लिम राष्ट्रों में भी अलग कानून की व्यवस्था नहीं है जहां शरीयत एवं कुरान के कानून मान्य हैं। वहां के अन्य धर्मावलम्बियों के ऊपर भी वही कानून लागू होते हैं। एकमात्र भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां मुस्लिम मतावलम्बियों के लिए नागरिक कानून से अलग शरीयत कानून लागू होता है। उन पर भारत की संसद के द्वारा बनाए गए कानून लागू नहीं होते। दूसरी तरफ सनातनी हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा सिखों पर संसद द्वारा बनाई गई एक समान नागरिक संहिता लागू होती है, जिसे हिन्दू लॉ कहते हैं। एक ही क्षेत्र में रहने वाले एक ही शासन द्वारा शासित नागरिकों पर भिन्न-भिन्न कानून के लागू होने का यह अद्भुत उदाहरण केवल भारत में ही मिलता है। (क्रमश:)

Monday, November 7, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (4)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(4)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 04-11-2011

मैंने एक बार नहीं अनेक बार लिखा है कि उन्माद की हिन्दुत्व में कोई जगह नहीं। उन्माद की भाषा मत बोलो, लाखों वर्ष की कालजयी विरासत पर कलंक मत लगाओ। मैंने बार-बार इस बात को दोहराया कि चाहे हिन्दू का जुनून हो चाहे मुस्लिम का जुनून हो, जब भी मारे जाते हैं निर्दोष ही मारे जाते हैं, जो गलत है। इस्लामी आतंकवाद पर भी मेरा यही कहना है कि प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने वाले इस्लाम के अनुयायियों को यह शोभा नहीं देता। किसी भी लेखक ने 'जहरीला इस्लाम' कभी नहीं लिखा, ऐसे में कुछ उन्मादियों को जहरीला हिन्दुत्व कहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। वह अपने भीतर झांकें और खुद का विश्लेषण करें।

मैं छद्म बुद्धिजीवियों से कहना चाहूंगा कि हिन्दुत्व को समझना है तो वेद की ऋचाओं से समझें,उपनिषदों के मंत्रों में झांक कर देखें, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के पावन चरित्र से जानें, श्रीकृष्ण की गीता में इस दर्शन को पहचानें, शिवाजी और बंदा बहादुर का चरित्र पढ़ें, लेकिन अफसोस इस राष्ट्र में भगवान राम को भी अपमानित किया गया। भारत और श्रीलंका को जोडऩे वाले पुल श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया और हद तो तब हो गई जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम के अस्तित्व को ही नकारने जैसी जघन्य राजनीति शुरू कर दी। जब प्रबल विरोध हुआ तो सरकार को हलफनामा वापस लेना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय की पाठ्य पुस्तकों में भी भगवान राम के बारे में अनर्गल टिप्पणियां की गईं जो हिन्दू समाज के लिए असहनीय हैं।

शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने देश के उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें यह निवेदन किया गया था कि बी.ए. (आनर्स) इतिहास के द्वितीय वर्ष में एक निबंध पढ़ाया जा रहा है जिसका शीर्षक है 'थ्री हण्ड्रेड रामायणा वीथ फाइव एक्‍जाम्‍पल'। निबंध के लेखक हैं ए.के. रामानुजन। इस निबंध में रामायण के सम्‍मानित चरित्रों जैसे राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, अहिल्या आदि के विषय में अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है। इसी निबंध में अन्य सामग्री के अतिरिक्त निम्रलिखित बातें पढ़ाई जा रही थीं-

· रावण और मंदोदरी की कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शिवजी की पूजा की। शिवजी ने उन्हें आम खाने को दिया। गलती से सारा आम रावण ने खा लिया और उसे गर्भ ठहर गया। दु:ख से बेचैन रावण ने छींक मारी और सीता का जन्म हुआ। सीता रावण की पुत्री थी। उसने उसे जनकपुरी के खेत में त्याग दिया।

· हनुमान छुटभैया एक छोटा सा बंदर था एवं कामुक व्यक्ति था। वह लंका के शयनकक्षों में स्त्रियों और पुरुषों को आमोद-प्रमोद करते बेशर्मी से देखता फिरता था।

· रावण का वध राम से नहीं लक्ष्मण से हुआ।

· रावण और लक्ष्मण ने सीता के साथ व्यभिचार किया।

· माता अहिल्या को यौन की एक मूर्ति बताया गया है, जिसका इन्द्र के साथ लज्जापूर्ण ढंग से यौन व्यभिचार दर्शाया गया है।

ए.के. रामानुजन द्वारा लिखित निबंध 'थ्री हण्ड्रेड रामायणा' एक पुस्तक में सम्मिलित था जिसका नाम था 'मैनी रामायण।' यह पुस्तक पौला रिचमेन (आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी) द्वारा सम्‍पादित की गई थी। सम्‍पादक ने अपनी पुस्तक में पुस्तक के उद्देश्य स्पष्ट किए थे। उनका कहना था कि यह पुस्तक रामानंद सागर द्वारा प्रदर्शित 'रामायण' टी.वी. सीरियल के अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव को निरस्त करने के लिए लिखी गई है।

शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने सन् २००८ में पुस्तक के प्रकाशक आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस,लंदन से सम्‍पर्क किया तथा निबंध के विषय में अपनी आपत्तिा बताई और कहा कि पुस्तक में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने खेद प्रकट किया, माफी मांगी तथा आश्वासन दिया कि उनका उद्देश्य हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। उन्होंने पुस्तक को वापस लेना स्वीकार किया। इसकी सूचना उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तथा दिल्ली विश्वविद्यालय को भी दी किन्तु इतिहास विभाग ने इसका संज्ञान नहीं लिया तथा अनधिकृत रूप से निबंध को अपने पाठ्यक्रम में पढ़ाना जारी रखा।

समिति ने न्यायालय से प्रार्थना की थी कि इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटा दिया जाए। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में कुछ विद्वानों की राय ली जाए। विद्वानों की राय विश्वविद्यालय की एकेडेमिक कौंसिल के सामने प्रस्तुत की जाए। कौंसिल के निर्णय के अनुसार उपकुलपति अग्रिम कार्यवाही करें। दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने न्यायालय के आदेश के अनुसार कार्यवाही करके पूरे तथ्य एकेडेमिक कौंसिल की बैठक में प्रस्तुत किए। सदस्यों ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए। कौंसिल ने इन विचारों का गम्‍भीरता से अध्ययन किया। कौंसिल के समक्ष यह तथ्य भी लाया गया कि उक्त निबंध केवल 2001 तक के लिए पाठ्यक्रम के लिए स्वीकृत था और सन् 2009 के पश्चात् उसे अनधिकृत रूप से पढ़ाया जाता रहा है। विषय के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद एकेडेमिककौंसिल ने विवादित निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया।

प्रख्‍यात विद्वान हृदय नारायण दीक्षित लिखते हैं कि जीवंत इतिहास बोध में ही राष्ट्र का अमरत्व है और विकृत इतिहास में राष्ट्र की मृत्यु। श्रीराम भारत के मन का रस और छंद हैं। रामानुजन के विवादित निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग हिन्दू धर्म के खिलाफ कुत्सित षड्यंत्र है।

इतने वर्षों से बच्चों को इतिहास की कक्षा में अश्लील कथा पढ़ाई जाती रही और भगवान राम का अपमान किया जाता रहा, हिन्दुओं की सहनशीलता को दाद तो देनी ही पड़ेगी। (क्रमश:)

Friday, November 4, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (3)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(3)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 03.11.2011

इस देश में हमेशा षड्यंत्र के तहत हिन्दुओं की आस्था पर करारी चोट की जाती रही है। हिन्दुओं के आस्था स्थलों की पहचान और हिन्दुओं के आराध्य देवों का अपमान किया जाता रहा है। पहले तो अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में इतिहास से छेड़छाड़ की और हिन्दुओं को पिछड़े, भ्रष्ट, कायर और दकियानूसी, पाखंडी तथा जातिवादी सिद्ध करने का प्रयास किया। मुस्लिम आक्रांताओं के काले कारनामों पर पर्दा डाला गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कांग्रेस के अनेक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं और वामपंथियों ने इतिहास को विकृत करने का प्रयास किया।

श्रीमती इंदिरा गांधी ने वामपंथी विचारधारा के डा. नुरुल हसन को केन्द्रीय शिक्षा राज्य मंत्री का पद सौंपा। डा. हसन ने तुरन्त इतिहास तथा पाठ्य पुस्तकों के विकृतिकरण का काम शुरू किया। वामपंथी इतिहासकारों और लेखकों को एकत्रित कर इस काम को अंजाम देना शुरू किया।

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का गठन किया गया और पाठ्य पुस्तकों में हिन्दुओं के बारे में अनर्गल बातें लिखी गईं। गोरक्षा के लिए भारतीयों ने अनेक बलिदान दिए। इसके बावजूद छात्रों को यह पढ़ाया गया कि आर्य गोमांस का भक्षण करते थे। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान देने वाले गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान को भ्रामक ढंग से वर्णित किया गया। प्रो. सतीश चन्द्र द्वारा लिखित एनसीईआरटी की कक्षा 11वीं की पुस्तक 'मध्यकालीन भारत' में लिखा गया-

''गुरु तेग बहादुर ने असम से लौटने के बाद शेख अहमद सरहिन्द के एक अनुयायी हाफिज आमिद से मिलकर पूरे पंजाब प्रदेश में लूटमार मचा रखी थी और सारे प्रांत को उजाड़ दिया था।''

''गुरु को फांसी उनके परिवार के कुछ लोगों की साजिश का नतीजा थी, जिसमें और लोग भी शामिल थे, जो गुरु के उत्तराधिकार के विरुद्ध थे। किन्तु यह भी कहा जाता है कि औरंगजेब गुरु तेग बहादुर से इसलिए नाराज था, क्‍योंकि उन्होंने कुछ मुसलमानों को सिख बना लिया था।''

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गुरु तेग बहादुर जैसी दिव्य विभूति को लुटेरा बताना और औरंगजेब के अत्याचारों की घटना पर पर्दा डालने का प्रयास करना अक्षम्‍य अपराध ही है। छद्म धर्म निरपेक्षता के ठेकेदारों ने हिन्दू समाज की गलत तस्वीर पेश की। जब केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्य पुस्तकों से गुरु तेग बहादुर, भगवान महावीर और अन्य महापुरुषों पर आरोप लगाने वाले अंश हटवाने का प्रयास किया तो धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने बवाल मचाना शुरू कर दिया और आरोप लगाया गया कि भाजपा सरकार शिक्षा का भगवाकरण कर रही है।

इस बवाल के बीच कट्टरपंथी कभी सरस्वती वंदना को इस्लाम विरोधी बताकर स्कूलों का बहिष्कार करते रहे तो कभी वे अपने बच्चों को 'ग' से गणेश पढ़ाने की बजाय 'ग' से गधा पढ़ाने की सीख देते रहे। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह जी और वीर सावरकर आदि के प्रेरक जीवन चरित्रों से छात्रों को वंचित किया जाता रहा। प्रफुल्ल बिदवई जैसे लेखकों ने अपने आलेख Fight Hindutva Head on में Poisonous Hindutva का इस्तेमाल किया था यानी जहरीला हिन्दुत्व। मैंने तब भी सवाल किया था-

उन्माद और नृशंसता की राजनीति की झीनी चादर देकर किसने ऐसा बना दिया कि भारत में हिन्दुत्व को जहरीला कहा जा रहा है?

तथाकथित कुछ अंग्रेजीदां बुद्धिजीवियों ने इस राष्ट्र के हिन्दुत्व को घृणा, विद्वेष, क्रूरता का पर्याय न केवल स्वीकार किया बल्कि बार-बार ऐसा लिखा भी। (क्रमश:)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग (2)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(2)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 02.11.2011

कल मैंने सवाल उठाया था कि क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? इस सवाल का जवाब अधिकांश लोग हां में देते हैं। आखिर ऐसी सोच क्‍यों पैदा हुई? भारत विश्व के दृश्यपटल पर सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष देश है। यह ऐसा धर्मनिरपेक्ष है, जैसी धर्मनिरपेक्षता होनी बड़ी मुश्किल है। जो नई नस्लें हैं,उन्हें क्‍या मालूम कि हम क्‍या चीज हैं। भारत आजाद हुआ, इसके लिए बाकायदा इंडियन इंडीपैंडैंस एक्‍ट बना, पाकिस्तान वजूद में आ गया। अंग्रेजों ने उन्हें कश्मीर नहीं दिया था। उसे हमारे साथ महाराजा हरि सिंह ने विलय किया था। ऐसा विलय 542 रियासतों ने पहले ही कर दिया था। सबकी बात हमने सुनी,मानी परन्तु कश्मीर में घुंडी अड़ गई। यह अनोखी धर्मनिरपेक्षता थी। शेख और महाराजा के अच्छे संबंध नहीं थे। महाराजा ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में कैद कर रखा था जबकि पंडित नेहरू और महाराजा के संबंध भी अच्छे नहीं थे। महाराजा की नजरों में नेहरू की चारित्रिक समग्रता संदिग्ध थी। शेख अब्‍दुल्ला तिलमिला उठे। वह बाहर आए, नेहरू से मिले और शेख ने चाल चल दी। 27 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया। यह एक पूर्ण रूप से सुनियोजित षड्यंत्र था। भयंकर मारकाट हुई। महाराजा ने अपनी रियासत को भारत के हक में विलयन के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। श्रीनगर तो बच गया, परन्तु हमारा 2/5 भाग पाकिस्तान ने जबरदस्ती हथिया लिया। पाकिस्तान की बलात्कारी फौज को जवाब देने के लिए हमारी सेना पहुंच चुकी थी। घनसारा सिंह और ब्रिगेडियर परांजपे मौजूद थे। छह घंटे के अन्दर हमारा भूभाग वापस आ सकता था, परन्तु सेना का नियंत्रण और उसे आगे बढऩे का अधिकार केवल शेख के हाथ में विशेष आदेश के द्वारा नेहरू ने दे रखा था।

कारण था- हमारी धर्मनिरपेक्षता।

सवाल भारतीयता का नहीं धर्मनिरपेक्षता का था। महाराजा हरि सिंह रोते रहे, हमने अपना भू-भाग गंवा दिया और मामला संयुक्त राष्ट्र तक जा पहुंचा।

हम अपनी सरजमीं से विशाल सेना होते हुए भी दुश्मन को खदेड़ नहीं सके। हमारी धर्मनिरपेक्षता आड़े आ गई। मामला संयुक्त राष्ट्र में लटक गया।

पाकिस्तान ने हमारे भू-भाग का 13 हजार वर्ग किलोमीटर 2 मार्च, 1963 को चीन को दान कर दिया। सीमा निर्धारण के बहाने किये गए इस कुकृत्य पर बतौर विदेश मंत्री भुट्टो ने हस्ताक्षर कर दिए और उधर चीन के तत्कालीन विदेश मंत्री चेन यी ने दस्तखत किए। इसी को कहते हैं 'माल महाराज का मिर्जा खेले खोली।' माल किसी का था और कमाल कौन कर रहा था। जब पंडित नेहरू पर दबाव पड़ा तो उन्होंने मगरमच्छी आंसुओं से भरा एक भाषण लोकसभा में 5 मार्च, 1963 को दिया था।

यह एक 'धर्मनिरपेक्ष और ढोंगी' प्रधानमंत्री की तकरीर थी। रो रहे थे कि हम क्‍या करें, अभी समय विपरीत है, हमने अपना 'प्रोटैस्ट' कर दिया है। कांग्रेसी बंधु इसे पढ़ें और अपना सिर पीटें।

नेहरू रोते क्‍यों न? 1962 के युद्ध में उन्होंने हमारी दुर्गति करवा दी। चीन के नाम से रूह कांप रही थी। इसकी सारी दास्तां तब ले. जनरल वी.एम. कौल ने अपनी किताब “Untold Story” में बयान कर दी। उसे भी आज पढ़ा जाना चाहिए लेकिन किसे फिक्र है जो इन दस्तावेजों में जाए? नेहरू का 1964 में निधन हो गया।

1965 में पाकिस्तान ने हम पर आक्रमण कर दिया। तब तक लाल बहादुर शास्त्री की कृपा से हम में बड़ा गुणात्मक फर्क आ गया था। हमने पाकिस्तान को दिन में तारे दिखवा दिए। हमारी सेनाएं लाहौर तक जा पहुंचीं। उन्होंने कच्छ के रण में हमारा एक हिस्सा कब्‍जे में ले लिया। पाकिस्तान ने चाल चली। हमारे परममित्र कोसीजिन से मिलकर अयूब ने ताशकंद में समझौता किया। हमने उनका सारा भूभाग छोड़ दिया, उन्होंने कच्छ में आज तक हमारी जमीन न छोड़ी। क्‍यों? हमने धर्मनिरपेक्ष तरीके से इसका प्रौटेस्ट किया। 1971 में फिर वही तारीख दुहराई गई।

हम चाहते तो शिमला समझौता में अपना कश्मीर वापस ले सकते थे, पर इंदिरा जी की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ गई। तब से लेकर आज तक कश्मीर जल रहा है। आज एक धर्मनिरपेक्ष सरकार हमारे देश में वजूद में आ गई है लेकिन इन 30-32 वर्षों में कश्मीर में क्‍या हुआ इसका हाल सुनें। कश्मीर घाटी से 2.14 गुना क्षेत्रफल जम्‍मू का है। कश्मीर घाटी से 4.35 गुना क्षेत्रफल लद्दाख का है। उस राज्य की 90 प्रतिशत आय जम्‍मू और लद्दाख से है। 10 प्रतिशत घाटी से है। सम्‍पूर्ण आय का 90 प्रतिशत हिस्सा घाटी में खर्च किया जाता है। कारण क्‍या है? हमें इस बात का मलाल नहीं कि 3 लाख हिन्दू क्‍यों निकाल दिए गए। हमें यह मलाल नहीं कि बौद्धों के साथ क्‍या हो रहा है। पर हमें इस बात की सबसे ज्यादा फिक्र है कि-

· वहां दो नागरिकताएं कायम रहें।

· अनुच्छेद 370 कभी न हटे।

· भारत का संविधान लागू न हो।

· वहां कोई जमीन न खरीद सके।

· भारत का कानून लागू न हो।

· वहां की बेटी भारत में कहीं शादी करे तो नागरिकता खो बैठे, और पाकिस्तान में करे तो वह यहां का नागरिक हो जाए।

जम्‍मू-कश्मीर की स्वायत्तता प्रस्ताव हमारी सरकार के पास है। अगर हमारी सरकार की धर्मनिरपेक्षता ने फिर जोर मारा, तो हम सिर्फ 'अभिन्न अंग' रह जाएंगे, और हमारा प्यारा कश्मीर De-Facto पाकिस्तान हो जाएगा और हमारे पास De-Jure कश्मीर ही रहेगा। हम तब इस अभिन्न अंग को गाएंगे, गुनगुनाएंगे, ओढ़ेंगे, बिछाएंगे और चरखे के गुण गाएंगे। जय बापू की-जय गांधी की।

अफसोस! एक अरब 25 लाख लोगों का यह मुल्क इतना मोहताज हो गया कि प्राचीन गौरव और परम्‍पराएं भूल गया। धिक्कार है इस राष्ट्र के धरती पुत्रों पर।

मानसिक रूप से इस राष्ट्र को 'निर्णायक जंग' के लिए तैयार करना होगा।

''जब किसी जाति का अहं चोट खाता है।

पावक प्रचंड होकर, बाहर आता है।

यह वही चोट खाए स्वदेश का बल है।

आहत भुजंग है, सुलगा हुआ अनल है।''

(क्रमश:)

Thursday, November 3, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग (1)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(1)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 01-11-2011

जीवन में कभी-कभी अतीत की गहराई में झांकना बड़ा ही अच्छा लगता है और सुखप्रद भी। यहां यह बात मैं राष्ट्रों के अतीत के संदर्भ में कह रहा हूं। भारतवर्ष के जिस तंत्र में हम रह रहे हैं और मूर्खतावश जिसे 'प्रजातंत्र' कहते हैं वह आजादी के पांच दशकों बाद कैसा सिद्ध हुआ है, इस पर यहां मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता।

मैं त्रेतायुग के काल से इस राष्ट्र की विभिन्न शासन प्रणालियों का अध्ययन पिछले दिनों कर रहा था। इसी क्रम में कुछ ऐसे तथ्यों की जानकारी मिली जिन्हें न केवल मैं पाठकों के साथ सांझा करना चाहता हूं, अपितु मेरी मंशा है कि हम कुछ बातों की प्रासंगिकता आज के युग में भी जानें। यह बात सत्य है कि श्रीराम को परिस्थितिवश बनवास जाना पड़ा, फिर भी ज्येष्ठ दशरथनंदन होने के नाते महाराज दशरथ यह देखकर चिंतित थे कि श्रीराम चिंता में हैं। कुछ प्रश्र उनके मन में उमड़-घुमड़ कर आते हैं और उन्हें व्यथित कर जाते हैं। यथासम्‍भव उन्होंने स्वयं भी उनका निराकरण किया और बाद में महर्षि वशिष्ठ को विस्तार से सारी बात बताई। श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ में एक लम्‍बा वार्तालाप हुआ। आज परम सौभाग्य की बात यह है कि इन सभी वार्तालापों सम्‍पूर्ण वृतांत 'योग वशिष्ठ' मूलत: संस्कृत में उपलब्‍ध ग्रंथ तो है ही, उसके कुछ अच्छे भाष्य भी उपलब्‍ध हैं।

आज इसे धार्मिक ग्रंथ की संज्ञा दी जाती है। योगशास्त्र का अद्भुत ग्रंथ भी माना जाता है, वैराग्य की भी बहुत सी बातें इसमें हैं परन्तु एक राजा का क्‍या कर्त्‍तव्य होना चाहिए, उसमें ऐसा सब कुछ निहित है। 'योग वशिष्ठ' अनुपम है किसी अन्य कृति से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

ठीक इसी प्रकार महाभारतकाल में एक अंधे राजा ने जब यह देखा कि उसकी विदुषी पत्नी ने भी आंखों पर पट्टी बांध ली और सारे के सारे राजकुमार नालायक निकल गए तो उस राजा ने विदुर जी को निमंत्रण दिया।

एक छोटा परन्तु बड़ा सारगर्भित ग्रंथ प्रकट हुआ। हम उसे कहते हैं-विदुर नीति।

भावी घटनाएं कुछ और थीं, वरना धृतराष्ट्र का यह प्रयास स्तुत्य था।

अब शिवाजी राजे की बात।

भारतवर्ष में हिन्द-पद-पादशाही का स्वप्न पूरा हुआ। शिवाजी महाराज को दिव्य निर्देश तो मिले,परन्तु उससे पहले एक अद्भुत कृति का प्राकट्य हुआ।

उसका नाम है- दास बोध। मनुष्य को स्वयं को अपनी पूर्णता में समझ पाने की वह अद्भुत कृति है। उसका आशय क्‍या है, क्‍या आप जानना चाहेंगे। आशय है :

'इक बहाना था जुस्तजु तेरी

दरअसल थी, मुझे खुद अपनी तलाश।'

दास बोध अद्भुत है। समर्थ गुरु रामदास जी ने अपने प्रिय शिष्य शिवा की झोली में 'दास बोध'डाला और शिवाजी ने समस्त राजपाट उन्हें समर्पित कर दिया और 'राजध्वज' को भगवे में रंग दिया और नारा लगा 'जय-जय-जय रघुवीर समर्थ।

इस श्रृंखला में कौटिल्य को कैसे भूलें।

अर्थशास्त्र का एक-एक वचन चीख-चीख कर कह रहा है कि इससे उत्कृष्ट रचना पिछले हजारों वर्षों में नहीं रची गई। योग वशिष्ठ, विदुर नीति, दास बोध और अर्थशास्त्र, सब कुछ हमारे पास था, फिर भी हम सदियों गुलाम रहे क्‍योंकि हम अपनी जड़ों से कट गए।

आज इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है। जिस राह पर हम चल रहे हैं वह सिवाय 'विध्वंस' के हमें कहां ले जाएगी?

कारण क्‍या है? कारण एक ही है कि 'गोरे अंग्रेजों' के हाथ से निकल कर राष्ट्र काले अंग्रेजों के हाथ में चला गया। यह सारे के सारे 'मैकाले' के मानसपुत्र थे। इन्होंने भारत को इसकी जड़ों से काट दिया।

'धर्मनिरपेक्षता' नामक शब्‍द भारत के माथे पर कोढ़ बनकर उभरा। यह आज भी इस राष्ट्र के लिए कलंक है। धर्म के प्रति न तो आज तक कोई निरपेक्ष हो सका है और न ही भविष्य में होगा क्‍योंकि धर्म चेतना का विज्ञान है, अत: यह हमेशा एक ही रहता है, दो नहीं हो सकता।

क्षमा, दया, शील, सच्चरित्रता यह धारण करने योग्य हैं, अत: जो इन्हें धारण करता है वही धार्मिक है, जो निरपेक्ष है, वह बेईमान है। अपने संस्कारों को अक्षुण्ण रखते हुए धार्मिक रहा जा सकता है।

भगवान कृष्ण ने गीता में कहा-

'स्वधर्मे निधनं श्रेयम्।'

इसका एक ही आशय है, अपनी निजता न खोओ।

अपने धर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है। ढोंगी न बनो। ढोंगी को तो नरक में भी जगह नहीं मिलती। भारत में सर्वधर्म समभाव के प्रणेता प्रकट हो गए। राजनीति ने ऐसा कलुष पैदा किया। भगवान कृष्ण ने कहा-अपना धर्म श्रेष्ठ, परन्तु किसी की विचारधारा का अनादर न करो। इन बेइमान पाखंडियों को देखो, जो सवेरे मजारों पर चादर चढ़ाते हैं, दोपहर को मंदिरों में जाते हैं, शाम को चर्चों में जाकर भाषण देते हैं तथा रात में गुरुद्वारे जाकर सिरोपा लेते हैं।

ऐसा लगता है, इन्हें बुद्धत्व प्राप्त हो गया?

सावधान! ये पहले दर्जे के पाखंडी हैं। यह ढोंग कर रहे हैं, जो राजनेता परमहंसों जैसा आचरण करे उसे क्‍या कहेंगे?

भारत के एक राज्य कश्मीर से चुन-चुन कर 'हिन्दुओं' को खदेड़ दिया गया था। यह राष्ट्र का बहुसंख्‍यक समाज है, यह अपने अभिन्न अंग में नहीं रह सकता। इनकी रक्षा का प्रबंध यह सरकार नहीं कर सकी क्‍योंकि सारी की सारी सरकारें 'धर्मनिरपेक्ष' हैं और पंडितों के लिए न्याय मांगने वाले साम्‍प्रदायिक करार दिए जाते रहे।

अगर सच कहना बगावत है, तो समझो हम भी बागी हैं।'

इस सम्‍पादकीय में मैं बहुत सारे सवाल उठाऊंगा। इतिहास के कुछ पन्नों का सहारा लेकर अपनी बात को स्पष्ट करूंगा कि इस हिन्दुस्तान में हिन्दुओं से कैसा व्यवहार होता रहा है। सिर्फ आज वोट बैंक की राजनीति की जा रही है। वोटों की खातिर अल्पसंख्‍यकों के तुष्टीकरण की नीतियां जारी हैं। आज मनमोहन सरकार कठघरे में खड़ी है और इतिहास का काल पुरुष सरकार से पूछता है- क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (क्रमश:)

Monday, September 12, 2011

कौन कहता हैं की कांग्रेस आज "गांधीवाद" के रास्ते को छोड़ चुकी हैं?

-एक व्‍यंग-

गाँधी: "कोई एक गाल पे तमाचा लगाए तो दूसरा गाल आगे करदो"
कांग्रेस: "कोई एक शहर में धमाका करे तो दुसरे शहर के लिए भी रास्ता खोल दो"


तो क्या हुआ जो कांग्रेस ने बाबा रामदेव के आन्दोलन को कुचलने के लिए आधी रात को रामलीला मैदान में पुलिस वेशधारी अपने 5000 गुण्‍डे भेज दिए?

तो क्‍या हुआ जो कांग्रेस ने अन्‍ना हजारे को तिहाड जेल भिजवा दिया और उन्‍हें हर प्रकार से प्रताडित करने की कोशिश की गई? तो क्‍या हुआ जो कांग्रेस ने बाबा रामदेव, आचार्य बालकृष्ण, अन्‍ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी आदि देशभक्‍तों को बदनाम करने के लिए साम, दाम, दण्‍ड, भेद आदि सभी नीतियां अपनाते हुए उनके पीछे CBI, IB, ID, व NIA आदि सभी सरकारी सुरक्षा एजेंसियों को लगा दिया?


अब जब सभी सुरक्षा एजेंसियां इस काम में लगा दी जायेंगी तो आतंकवादी तो अपने नापाक मनुसूबों में कामयाब हो ही जायेंगे और इसका एकमात्र कारण है कांग्रेस और सिर्फ कांग्रेस, जो टाडा हो या बीजेपी द्वारा बनाया गया पोटा आतंकवादी विरोधी कानून हो, कांग्रेस ने सत्‍ता में आते ही पहला काम इसे हटाने का किया सिर्फ इसलिए कि मुसलमान कही नाराज ना हो जाए

आतंकवादियों के सम्बन्ध में कांग्रेस का गाँधीवादी रास्ता आज भी बरकरार हैं और आगे भी ऐसे ही बरकार रहेगा....

कांग्रेस : जिन्‍ना की तहरीर ?

साम्‍प्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक के प्रारूप को लेकर जिस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों ने असन्तोष प्रकट किया है वह पूरी तरह जायज है क्‍योंकि भारत के नागरिकों को बहुसंख्‍य व अल्पसंख्‍य में बांट कर अगर कानून की तहरीरें लिखी जायेंगी तो यह देश फिर टुकड़ों में बिखर जायेगा। मगर इससे भी बड़ा सवाल एक और है जिसकी तरफ फिलहाल किसी राजनीतिक दल ने या तो ध्यान नहीं दिया है या फिर इसे वे जानबूझ कर अनदेखा करना चाहते हैं। यह सवाल है कि मुल्क की हुकूमत डा. मनमोहन सिंह की सरकार चला रही है या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा चुने गये कुछ चाटुकार मनपसन्द लोग चला रहे हैं? कानून बनाने का अधिकार किसका है? सरकार का या संसद से बाहर बैठे हुए कुछ स्वनामधन्य विशेषज्ञों का? यह विधेयक सरकार के गृह मन्त्रालय या कानून मन्त्रालय ने तैयार नहीं किया है बल्कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। इस परिषद की संवैधानिक वैधता क्‍या है? किस हैसियत से आज पूरा देश इस विधेयक पर विचार कर रहा है? अब संसद का वह अधिकार कहां गायब हो गया है जो अन्ना हजारे के जन लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर सामने आ गया था?

यह समझा जाना चाहिए कि सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं जबकि मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमन्त्री हैं। वह इस देश के प्रत्येक राजनीतिक दल के नागरिकों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर सलाहकार परिषद के किसी विधेयक पर विचार होना है तो वह कांग्रेस पार्टी के महाधिवेशन में होना चाहिए न कि राष्ट्रीय एकता परिषद में। इस परिषद की स्थापना ही दलगत भेद को भूल कर राष्ट्रीय एकात्मता स्थापित करने के उद्देश्य से की गई थी। इसमें किसी विशिष्ट पार्टी के एजैंडे पर कैसे बातचीत हो सकती है। मगर हो रही है और खुद प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह करा रहे हैं। सवाल खड़ा हो सकता है कि फिर उनके 80 मन्त्री क्‍या कर रहे हैं? क्‍या यह भी गठबन्धन की बेचारगी है? मुझे लगता है कि यह वह मजबूरी है जो डा. मनमोहन सिंह को इस देश का मनोनीत प्रधानमन्त्री बना कर की गई थी और एहसान लादा गया था कि 'हमारे ही दिये गये तोहफे के दम से तुम हो।' क्‍या भारत का प्रधानमन्त्री किसी के एहसान का मोहताज है कि वह अपना संवैधानिक कार्य भी पूरी स्वतन्त्रता के साथ न कर सके। किस प्रकार इस देश में ऐसे साम्‍प्रदायिक विधेयक को कानून बनाया जा सकता है जो बहुसंख्‍य समाज को आततायी घोषित करके ही कांग्रेस पार्टी के लिए वोट इकट्ठाा करने का इन्तजाम बांधे। यह सवाल हिन्दू-मुसलमान से नहीं जुड़ा है बल्कि भारत की रगों में बहते उस खून से जुड़ा हुआ है जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है। क्‍या कांग्रेस पार्टी इस सवाल का जवाब दे सकती है कि 1947 में इस मुल्क के दो टुकड़े मजहब को धार बना कर क्‍यों हुए? वह कौन-सी मानसिकता थी जिसकी वजह से पाकिस्तान की तामीर हुई? निश्चित रूप से वह मानसिकता ठीक उसी प्रकार की थी जिस प्रकार की इस विधेयक में पेश की गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि 1947 में मुहम्‍मद अली जिन्ना इस मानसिकता के तहत काम कर रहे थे और आज यह सलाहकार परिषद कर रही है। जरा इन से कोई पूछे कि उस हिन्दोस्तान के लोगों को इन्हें हिन्दू और मुसलमान व अल्पसंख्‍यक और बहुसंख्‍यक में बांटने का अधिकार किसने दे दिया जिसका संविधान यह ऐलान करता है कि देश के सभी नागरिकों के हक बराबर हैं और कानून की नजर में न कोई हिन्दू है और न मुसलमान या सिख व ईसाई।

मगर अफसोस वोटों को पक्का करने के लिए इस मुल्क के लोगों को यह एहसास कराया जा रहा है कि वे कानून की नजर में भी अपने-अपने धर्म के आइने में देखे जायेंगे। पहले इस सलाहकार परिषद को भारत का संविधान गौर से पढ़ लेना चाहिए। क्‍या यह परिषद भारत का संविधान भी बदलेगी और मनमोहन सिंह से कहेगी कि हमारे एहसानों को चुकाओ और इस पर अपनी मुहर लगाओ। याद रखा जाना चाहिए भारत के जिस बहुसंख्‍य हिन्दू समाज को आततायी चंगेज खान से लेकर औरंगजेब तक जैसे सुल्तान हिंसक नहीं बना सके और उन्होंने अपने ही भाइयों को अपना मजहब बदलने के बावजूद गले से लगाये रखा उसे ये हवा में गांठे मारने वाले लोग किस तरह हिंसक बना सकते हैं ?


साभार :-

पंजाब केसरी 12 सितम्‍बर 2011

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...