Wednesday, November 16, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग-(12)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(12)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 12-11-2011

आज मैं चर्चा करूंगा शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक की। शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक को लेकर जिस तरह से साम्‍प्रदायिक राजनीति की गई वह काफी अशोभनीय रही। हाल ही में संसद की गृह मंत्रालय की स्थायी समिति ने शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक को एक मत से नामंजूर कर दिया। इसकी पुरजोर वकालत कर रहे गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम और विधि मंत्री सलमान खुर्शीद के लिए यह करारा झटका है। संसदीय समिति ने राजा महमूदाबाद एम.के. मुहम्‍मद खान का पक्ष भी सुना, जो सुप्रीम कोर्ट में शत्रु सम्‍पत्ति मामले में याचिकाकर्ता थे।

दरअसल गृह मंत्रालय विधेयक में किए गए बदलावों पर समिति को स्पष्टीकरण देने में विफल रहा। विधेयक पर संसदीय समिति का फैसला वैसे तो देश भर की शत्रु सम्‍पत्तियों से जुड़ा है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश पर होगा। वहां राजा महमूदाबाद विभाजन के समय अपने पिता के पाकिस्तान चले जाने के बाद शत्रु सम्‍पत्ति के तहत गई भारी-भरकम जायदाद हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के उम्‍मीदवार थे। पूर्व में अदालत में उनके इस मामले को चिदम्‍बरम एवं खुर्शीद कानूनी सलाह भी दे चुके हैं। भाजपा सांसद वेंकैया नायडू की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट गुरुवार को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को सौंप दी है। रिपोर्ट सभी दलों की आम राय से मंजूर की गई है, जिसमें कांग्रेस के दस सांसद भी शामिल हैं। समिति ने सिफारिश की है कि सरकार उसके सुझावों के मुताबिक मौजूदा विधेयक की जगह नया विधेयक लेकर आए। समिति ने कहा है कि हजारों करोड़ रुपए की शत्रु सम्‍पत्ति उन लोगों के हाथ में नहीं जानी चाहिए,जिनका उस पर वैधानिक हक नहीं है। भारत नीति प्रतिष्ठान के अनुसार लोकनीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हित होता है। यह संकीर्णताओं से ऊपर होता है। न्यायालय या जनमत इसे जरूर प्रभावित करता है परन्तु कार्यपालिका एवं विधायिका से ऐतिहासिक, सामाजिक एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में ऐसी अनेक प्रवृत्तियों की उत्पत्ति हुई है जिनसे लोकनीतियों एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन हो रहा है। इसी का उदाहरण वर्तमान विवाद है। भारत सरकार के ही दो मंत्री गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम एवं विधि, अल्पसंख्‍यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद, इस विषय पर एक-दूसरे का प्रतिवाद करते रहे। गृह मंत्रालय की दृढ़ता को तोडऩे के लिए जिस राजनीतिक ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया वह दशकों से भारत की राजनीति एवं नीति निर्धारकों को कमजोर करती रही है। यह है अल्पसंख्‍यक हित के नाम पर लोकनीतियों को पुनर्परिभाषित करने के लिए दबाव। यही हुआ शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम के संबंध में। कुलीनों ने अपनी राजनीति को जमीन पर उतार कर इसे 'मुस्लिम मुद्दा' बना दिया। कार्यपालिका के विवेक एवं तर्क का स्थान क्रमश: संकीर्णता एवं भावना ने ले लिया। मुस्लिम सांसदों ने एकजुट होकर शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम से जुड़े पक्षों को मुस्लिम विरोधी बताया और राजनीति में वही परम्‍परागत साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण इस विषय पर भी हो गया।

विभाजन के बाद लाखों लोगों ने भारत-पाक की सीमा लांघी थी। स्वाभाविक है कि लोगों की राष्ट्रीयता भी बदली। ऐसे शरणार्थियों की सम्‍पत्तियों को भारत एवं पाकिस्तान की सरकारों ने अधिग्रहण कर Custodian के अन्तर्गत कर दिया। उन लोगों को भी पाकिस्तान छोडऩे के लिए बाध्य किया जो ऐसा ही चाहते थे। इसी क्रम में भारत में Evacuee Property Act आया था। पाकिस्तान एवं बाद में बंगलादेश ने शत्रु सम्‍पत्तियों को अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था के ढांचे में उपयोग कर लिया। भारत में व्यवस्था की कमजोर इच्छा-शक्ति ने इसे गैर कानूनी कब्‍जे एवं किरायेदारों के हवाले कर दिया। साठ के दशक तक इन सम्‍पत्तियों को शत्रु सम्‍पत्ति नहीं माना गया। जो लोग इसे मुस्लिम प्रश्न मानते हैं उन्हें शत्रु सम्‍पत्ति का या तो ज्ञान नहीं है या वे जानबूझकर तथ्यों को अनदेखा कर रहे हैं।

शत्रु सम्‍पत्ति की अवधारणा भारत में 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद आई जब शत्रु राष्ट्र से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जुड़े सक्रिय लोगों की सम्‍पत्ति सरकार ने अधिग्रहित कर ली। फिर पाकिस्तान के साथ 1965 में युद्ध हुआ। स्वाभाविक था जो भारत-चीन युद्ध के समय हुआ था वही नीति दुहराई गई। तभी 1968 में शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम आया। राजा महमूदाबाद 1958 में स्वेच्छा से पाकिस्तान गए थे। उनकी सम्‍पत्ति को शत्रु सम्‍पत्ति के तहत अधिग्रहित कर लिया गया। इसे अल्पसंख्‍यक तथा बहुसंख्‍यक प्रश्र मानना देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया को भ्रमित एवं कमजोर करना है, परन्तु सरकार ने इसी कमजोरी का परिचय देते हुए अपने ही द्वारा लाए गए पहले विधेयक को निरस्त कर नया विधेयक तैयार किया। द्वितीय शत्रु सम्‍पत्ति (संशोधन और विधिमान्यकरण) विधेयक 2010, जो साम्‍प्रदायिक राजनीति के दबाव में तैयार किया गया विधेयक है। नीति का गलत या सही होना उतना दुष्परिणामकारी नहीं होता है जितना कि संकीर्णतावादी ताकतों के दबाव में उसका निर्माण करना होता है। राष्ट्रीयता से जुड़ा यह कानून अपरिवर्तनीय होना चाहिए था। न्यायालय ने इसे घसीटकर साम्‍प्रदायिकता के दायरे में ला खड़ा कर दिया है। (क्रमश:)

Monday, November 14, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग-(11)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(11)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 11-11-2011

धर्मनिरपेक्ष शब्‍द की धारणा के कारण हमारे देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र (Secular Nation) कहा जाने लगा। राष्ट्र का धर्म से कुछ लेना-देना नहीं इसलिए यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यदि संविधान में शुरू से सैकुलर का अनुवाद धर्मनिरपेक्ष न करके सम्‍प्रदाय निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष कर दिया जाता तो भ्रांत धारणाएं पैदा नहीं होतीं। धर्मनिरपेक्षता को अस्त्र बनाकर हिन्दुत्व पर आघात किया जाता रहा। कांग्रेस,कम्‍युनिस्ट और अन्य दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान, ईसाइयों को विशेषाधिकार दिए जाने की मांग शुरू कर दी। वोटों के लालच में इस शब्‍द का खुला दुरुपयोग किया जाने लगा। जब कभी हिन्दू हितों की बात हो तो उन्हें धर्मनिरपेक्षता विरोधी बताकर विरोध किया जाने लगा। इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष शब्‍द को हिन्दू विरोध का पर्यायवाची मान लिया गया। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने हिन्दू मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग रोकने के लिए एक आयोग बनाया था। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इस पर आपत्ति करते हुए संसद में कहा था कि क्‍या केवल मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का ही दुरुपयोग होता है? क्‍या मस्जिदों और गिरजाघरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग नहीं होता? क्‍या सैकुलर स्टेट में सबके लिए एक सा कानून नहीं होना चाहिए?

हमारे देश में रिश्वत देना और लेना दोनों ही कानूनी अपराध हैं और इसके लिए दंड का प्रावधान भी है। आजकल 'सुविधा शुल्क' के नाम से जाने जाने वाली रिश्वत को हमारी सरकार संविधान के अनुच्छेदों में संशोधन करके जनता तक पहुंचाती है तथा इस प्रकार यह वैध और प्रासंगिक बन जाता है। आजादी के समय से ही आरक्षण का हमारे देश के विकास के लिए कुछ खास जातियों और जनजातियों के लिए प्रावधान किया गया था लेकिन वोट बैंक पर अपना कब्‍जा बनाए रखने के लिए और अपनी झूठी भावना के साथ जनभावना जोडऩे के लिए इसकी अवधि आज तक बढ़ाई जा रही है। सरकारें बदलीं,लेकिन न ही वोट बैंक की राजनीति खत्म हुई और न ही आरक्षण की अवधि बढ़ाने का सिलसिला थमा। अलबत्ता आरक्षण का दायरा बढ़ा दिया गया और इसमें कोटा भी शामिल हो गया। वोटों की राजनीति ने मंडल कमीशन को जन्म दिया और गुर्जरों ने आंदोलन कर खुद के लिए कोटा हासिल किया या यूं कहें कि सरकार से कोटा छीना। यूपीए सरकार ने तो प्राइवेट सैक्‍टर में भी आरक्षण की बात कह डाली लेकिन चूंकि प्राइवेट सैक्‍टर पर सरकार का कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं है इसलिए सरकार को इसमें असफलता ही हाथ लगी। सरकार ने प्राइवेट सैक्‍टर के लिए दूसरी चाल चली और घोषणा की कि सरकार सरकारी खरीद का 4 प्रतिशत उन कम्‍पनियों से करेगी जिनका स्वामित्व दलित और अनुसूचित जातियों के पास है।

हालांकि यह बात अलग है कि आरक्षण और कोटा जैसी सुविधाओं का लाभ असली जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं पाता, बल्कि क्रीमीलेयर इसका फायदा ज्यादा उठाते हैं। आज हालात यह हैं कि पढ़ाई,नौकरी, व्यापार हर क्षेत्र में आरक्षण को जगह मिली है। यहां तक कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी आरक्षण लागू है। यह बात समझ से परे है कि मानव जीवन से जुड़े पेशे में आरक्षण देना वोट बैंक की राजनीति के अलावा क्‍या हो सकता है? इसे तो सीधे तौर पर 'राजनीतिक घूस' कहा जा सकता है।

अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तो कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। राहुल गांधी के भरसक प्रयासों से भी कांग्रेस के वहां पुनर्जीवित होने के आसार दिखाई नहीं देते। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा की नजरें मुस्लिम वोट बैंक पर हैं और कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के लिए ऐसा ब्रह्मास्त्र छोडऩा चाहती है, जिससे उसे चुनावी जीत हासिल हो। मुख्‍यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मुस्लिम समाज के लिए आरक्षण की मांग की थी। बस फिर क्‍या था केन्द्रीय विधि मंत्री पहुंच गए लखनऊ और कर दिया ऐलान कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इस मामले में काफी गम्‍भीर हैं और सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों को आरक्षण की घोषणा जल्द कर दी जाएगी। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि सरकार सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल करने के लिए तैयार है। चुनावों से पहले मुस्लिमों को आरक्षण एक सीधी रिश्वत है। सवर्ण हिन्दू गरीबी में भले ही एडिय़ां रगड़-रगड़ कर मर जाए कोई नहीं पूछता। न सरकार, न रिश्तेदार, न मित्र, कोई सहायता नहीं करता लेकिन मुस्लिमों को इस बात से सतर्क रहना होगा कि चुनाव से पहले सहानुभूति जताकर राजनीतिक दल उनसे धोखा तो नहीं कर रहे। (क्रमश:)

हिन्‍दुओं की कत्लगाह बनता पाकिस्तान

अभिषेक रंजन

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय खासकर हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गए हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक इसाई, हिंदू और सिख कौम पर पाकिस्तान में हमले कोई नई बात नहीं है। यही वजह है कि डरे-सहमे अल्पसंख्यक लोग भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपने जानमाल की हिफाजत करने के लिए पाकिस्तान से पलायन कर रहे हैं। इसकी चिंता न तो इस्लामाबाद को है और न ही नई दिल्ली में बैठी हमारी सरकार को।

ताजा घटना सिंध की राजधानी कराची से 400 मील दूर चक कस्बे की है। यहां ईद-उल-जुहा के दिन बंदूकधारियों ने तीन हिंदू डॉक्टरों की हत्या कर दी, जिसके बाद अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय में दहशत का माहौल व्याप्त है। दरअसल, फीस के मुद्दे पर झगड़ा होने के बाद इस कबीले के कुछ लोग बदला लेने की फिराक में थे। दिवाली से ठीक पहले तीन हिंदू युवकों को एक मुस्लिम नर्तकी के साथ पकड़ लिया गया। कबीले के लोगों ने कहा कि लड़की के साथ बलात्कार हुआ है। लिहाजा, इसके बदले में एक हिंदू लड़की दी जाए, जिसके साथ चार मुस्लिम बलात्कार करेंगे। हिंदुओं को यह बात बेहद नागवार गुजरी, क्योंकि न तो उस नर्तकी के साथ बलात्कार किया गया था और न ही उसे नाचने के लिए मजबूर किया गया था। घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाई है। इससे यह बात साबित होती है कि किस तरह पाकिस्तान की पुलिस ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों का साथ देती है।

गौरतलब है कि चक कस्बे में हिंदुओं की कुल आबादी पचास हजार के करीब है। इस घटना के बाद यहां के लोग इस कदर खौफजदा हैं कि उन्होंने घरों से निकलना बंद कर दिया। एक लिहाज से वहां कई दिनों तक अघोषित कफ्र्यू जैसा माहौल था। हिंदू डॉक्टरों की हत्या के बाद पाकिस्तान हिंदू परिषद ने राष्ट्रपति जरदारी, चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी और सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी से अपील की है कि सिंध के अलग-अलग हिस्सों में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को रोका जाए।

बता दें कि पाकिस्तान की 17.5 करोड़ की आबादी में हिंदुओं की संख्या दो प्रतिशत से भी कम है। पाकिस्तान की आज जैसी हालत हो गई है, उस स्थिति में वहां रहने वाले हिंदू, इसाई और सिख समुदाय के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इसी साल जनवरी में ईश निंदा के आरोप में लाहौर जेल में बंद ईसाई महिला आसिया बीवी की हिमायत करने की खातिर पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक मुमताज कादरी ने इस्लामाबाद में कर दी थी। उसके दो महीने बाद ही पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की भी हत्या कर दी गई। मारे गए ये दोनों नेताओं की गिनती एक उदार शख्स के रूप में होती थी। तसीर और भट्टी दोनों सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सीनियर लीडर थे, लेकिन अफसोस की बात यह है कि जरदारी और गिलानी की हुकूमत उनकी शहादत से कोई सीख नहीं लेना चाहती। इससे ज्यादा तकलीफ की बात और क्या हो सकती है कि जिस विवादास्पद ईश निंदा कानून में संशोधन करने की मंशा इन्होंने जाहिर थी, उस प्रस्ताव को गिलानी सरकार ने वापस ले लिया। उनके इस कदम से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को काफी धक्का लगा है। जिस सोच के साथ पाकिस्तान की बुनियाद पड़ी थी, वह ख्याल आज कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। यह अफसोसनाक है कि मुहम्मद अली जिन्ना ने जो तसव्वुर किया था, वह सही मायनों में पाकिस्तान का मुकद्दर नहीं बन सका।

आज दुनिया तरक्की का ख्वाब देख रही है, लेकिन पाकिस्तान अपनी रुढि़वादी सोच पर ही कायम है। बच्चों में धार्मिक कट्टरवाद का बीज बोने के साथ ही वहां खुलेआम हिंदुओं के प्रति नफरत का पाठ पढ़ाया जा रहा है। स्कूलों की पाठ्य पुस्तकें ईसाइयों और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगल रही हैं। इन किताबों में अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में सामने लाया जा रहा है। एक अमेरिकी रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाठ्य पुस्तकों के इस्लामीकरण का काम सैन्य शासक जिया उल हक के जमाने में ही शुरू हो गया था। इसके बाद वर्ष 2006 में सरकार ने किताबों से विवादास्पद अंश हटाने की घोषणा की, लेकिन यह कागजों तक ही सीमित रह गई।

वर्ष 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद कहा गया कि था कि यहां अल्पसंख्यकों को पूरे अधिकार दिए जाएंगे, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश जरूर होगा, लेकिन आज के हालात पर गौर करें तो पाकिस्तान में गैर मुसलमानों की परिस्थितियां खासी चिंताजनक हैं। उनकी अपनी पहचान एक तरह से खो गई है। बंटवारे से पहले पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगभग 20 फीसदी थी, जो छह दशकों के बाद महज दो फीसदी रह गई है। जितने हिंदू बचे हैं, वे किस तरह जी रहे हैं, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान में रहने वाले लाखों हिंदुओं के किसी भी त्योहार पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई छुट्टी घोषित नहीं है। चाहे दिवाली-दशहरा हो या रामनवमी, हिंदुओं को इस खास दिन भी छुट्टी नहीं दी जाती। अल्पसंख्यकों के हितों की बात करने वाली पाकिस्तान सरकार के पास इस बात का कोई जबाव है?

जहां तक भारत की बात है कि उसने तो पाकिस्तान के हिंदुओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने मालदीव गए। वहां उनकी मुलाकात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी से हुई। दोनों नेताओं ने गर्मजोशी के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बात की, लेकिन पाकिस्तान में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री ने अपने समकक्ष से कोई चर्चा नहीं की।

दरअसल, अभी इस्लामाबाद और नई दिल्ली की सरकार अपने आपसी रिश्ते और कारोबारी रिश्तों की मजबूती पर जोर दे रही हैं। लेकिन दोनों सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरहदों के दोनों ओर अगर आम आदमी सुरक्षित नहीं हैं तो अमन बहाली की सारी कोशिशें बेकार हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

स्रोत:- दैनिक जागरण 14 नवम्‍बर 2011

पाकिस्‍तान में हिंदू होना मानो अपराध है







पाकिस्‍तान में हिंदू होना मानो अपराध है

अरविंद जयतिलक



पाकिस्तान में अल्पसंख्य समुदाय खासकर हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार कोई नई बात नहीं है। विभाजन के बाद से ही वहां के हिंदू बाशिंदों को एक साजिश के तहत खत्म किया जा रहा है। एक फीसदी से कुछ ज्यादा अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय कट्टरपंथियों की आंखों में शुरू से चुभते आए हैं। कट्टरपंथी ताकतें उन्हें खत्म करने के लिए दो रास्ते अपना रखी हैं। एक तो उनकी हत्या करना और दूसरा उनका जबरन धर्मातरण कराना। भारत सरकार चुप है। हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्या पर कड़ी प्रतिक्रिया देने से भी कतरा रही है। इस मामले में अमेरिका की तारीफ करनी होगी। उसने तीन हिंदू डॉक्टरों की हत्या की कड़ी निंदा की है। पाकिस्तान से कार्रवाई की मांग भी की है। अमेरिकी विदेश विभाग के हवाले से कहा गया है कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाना अनुचित है और पाकिस्तान सरकार को हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन सच यह है कि यह सब खेल पाकिस्तान सरकार के इशारे पर चल रहा है। लिहाजा, हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई संभव ही नहीं है।

पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और ब्लूचिस्तान में स्थिति और भयावह है। अल्पसंख्यक हिंदू-सिख समुदाय की जान सांसत में है। कट्टरपंथियों ने इन पर जजिया कर लगा रखा है। जजिया न चुकाने वाले हिंदू-सिखों की सरेआम हत्या की जा रही है। उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है। कई सौ हिंदू-सिख परिवार घर-बार छोड़कर भाग गए हैं। उनकी संपत्तियां लूट ली गई हैं। उनके आस्था केंद्रों को तबाह कर दिया गया है। मंदिरों और गुरुद्वारों को आग के हवाले किया जा रहा है। मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं।

पिछले साल सिंध प्रांत में एक हिंदू लड़के द्वारा मस्जिद के कूलर से पानी पी लेने से बवाल मचा था। कट्टरपंथियों ने उसे खूब मारा-पीटा। डर के कारण 400 हिंदू परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। पाकिस्तान में हिंदू होना अपराध हो गया है। पिछले दिनों प्रकाशित पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) की रिपोर्ट से भी पाकिस्तान की असली तस्वीर उजागर हो जाती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की स्थिति बेहद दयनीय है। वे गरीबी-भुखमरी के दंश से पीडि़त हैं। आर्थिक रूप से बदहाल हैं। वे आतंक, आशंका और डर के साए में जी रहे हैं। उनके साथ भेदभाव हो रहा है। पाकिस्तान का अल्पसंख्यक समुदाय सरकार से एक अरसे से अपने जीवन की सुरक्षा और मान-सम्मान की रक्षा की मांग कर रहा है। कुछ सामाजिक संगठन भी अल्पसंख्यकों के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं, लेकिन उन्हें डरा धमका कर चुप करा दिया जा रहा है।

पाकिस्तानी सीनेट की स्थायी समिति ने बहुत पहले ही इस तरह की अघोरतम घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सरकार से ठोस उपाय करने का सुझाव दिया था, लेकिन पाकिस्तान सरकार ने कोई ठोस पहल नहीं की। जाहिर है कि सरकार की मंशा और नीयत में खोट है। वह अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देकर कट्टरपंथियों और कठमुल्लों को नाराज करना नहीं चाहती है। वह धार्मिक अल्पसंख्यकों को तुच्छ और दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखना चाहती है। तमाशा देखिए कि अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर महज एक ईसाई सांसद तय किया जाता है।

  • कानूनी तौर पर भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ नाइंसाफी जारी है। एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान है।
  • हिन्‍दुओं की उंगलियां काटना, अंग-भंग करना और हाथ-पैर तोड़ना आम बात है।
  • जीवित अल्पसंख्यकों के साथ तो पाकिस्तानी सरकार और अवाम संवेदनहीनता दिखाती ही है,
  • मृतकों के साथ भी उसका आचरण गैर-इंसानियत वाला ही होता है।
  • हिंदू अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाने के लिए उनके शवों की जलती चिता में पानी डालना, अधजले शवों को घसीटकर गंदे नाले में फेंक जाना आम बात है।
  • पाकिस्तान ने सरकार हिंदू बस्तियों से कई सौ किलोमीटर दूर श्मशान स्थल की व्यवस्था की है।
  • अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर हाल ही में प्रकाशित अमेरिकी आयोग की एक रिपोर्ट तो और चौंकाने वाली है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी स्कूलों की किताबें अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के खिलाफ नफरत और असहिष्णुता को बढ़ावा देती है।
  • स्कूलों की जहरीली मजहबी शिक्षा का ही नतीजा है कि पाकिस्तान में भारत को चिर प्रतिद्वंद्वी मानने वाली विचारधारा को काफी तवज्जो मिल रही है।
  • भारत सरकार को पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू-सिखों पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगाने के लिए तत्काल दबाव बनाना चाहिए।

स्रोत:- दैनिक जागरण 14 नवम्‍बर 2011

Sunday, November 13, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (10)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(10)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 10-11-2011

यह इस देश का दुर्भाग्य रहा कि 1895 में एक अंग्रेज लार्ड एलन ओक्‍टावियन ह्यूम द्वारा स्थापित कांग्रेस ने शुरू से ही हिन्दुत्व विरोधी रवैया अपनाया और देश की आजादी के साथ विभाजन को भी स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने मजहब के आधार पर देश विभाजन के बाद भी अपनी हिन्दुत्व विरोधी व मुस्लिम तुष्टीकरण की राष्ट्र घातक नीति को नहीं छोड़ा। यह सिलसिला आज तक चल रहा है। मनमोहन सरकार ने तुष्टीकरण की सभी सीमाएं लांघ दी हैं। सरकार ने 2005 से केन्द्रीय योजना आयोग की वार्षिक योजनाओं में अनुसूचित जाति के लिए विशेष कम्‍पोनेंट योजना समाप्त कर दी थी। दूसरी ओर राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हकमुसलमानों का बना दिया।

27 जून, 1961 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने सभी मुख्‍यमंत्रियों को पत्र लिखकर अवगत कराया था कि मजहब के आधार पर किसी भी प्रकार का आरक्षण न किया जाए। इसी प्रकार 1936 में पूना पैक्‍ट के बाद जब अंग्रेज सरकार ने अनुसूचित जाति की पहली सूची जारी की थी तो धर्मांतरित ईसाई व मुसलमानों की जातियां उसमें शामिल करने की मांग उठाई गई थी, जिसे अंग्रेज हुकूमत ने अस्वीकार कर दिया था। किन्तु मनमोहन सरकार इसमें भी नहीं चूकी और सच्चर कमेटी के बाद रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन करके धर्मांतरित ईसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का आरक्षण करने हेतु पैरवी प्रारम्‍भ कर दी। प्रारम्भिक तौर पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह ने भी इसका विरोध किया किन्तु सोनिया गांधी जैसों की सहमति देखकर शांत हो गए।

वस्तुत: 16 दिसम्‍बर, 2004 को कैथोलिक विशप कांग्रेस आफ इंडिया ने नई दिल्ली में 34 ईसाई और 14 गैर ईसाई अर्थात कुल 48 सांसदों की बैठक बुलाई, जिनमें धर्मांतरित ईसाई और मुसलमानों को अनु. जाति के आरक्षण का लाभ दिलवाने संबंधी जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल करने का विचार तय हुआ। इस याचिका के संदर्भ में केन्द्र सरकार ने अपनी सहमति व्यक्त की, जिसका बयान सरकार के वकील ने कोर्ट में दिया, इस पर न्यायालय ने सहमति का आधार जानना चाहा। आधार बताने के लिए बड़े ही नाटकीय ढंग से रंगनाथ मिश्र आयोग बनाकर सरकार ने 10 मई, 2007 को मनमानी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत कर दी जबकि सुप्रीम कोर्ट पंजाब राव बनाम मेश्राम (1965),रामालिंगम बनाम अब्राह्म (1967), सूसाई बनाम भारत संघ (1987) आदि विवादों से पहले ही इस विषय पर असहमति व्यक्त कर चुका है, लेकिन केन्द्र सरकार की नीयत कैसी विचित्र है कि 10 मार्च, 2006 को अल्पसंख्‍यक शिक्षण संस्थानों में अनु. जाति एवं पिछड़े वर्ग के आरक्षण की व्यवस्था को छात्रों के प्रवेश के संबंध में समाप्त कर दिया गया जबकि धर्मांतरित ईसाई व मुसलमानों को अनुसूचित जाति का आरक्षण दिलवाने की पैरवी प्रारम्‍भ कर दी गई। सचमुच में यह धर्मांतरण को प्रेरित करके भारत में हिन्दू जनसंख्‍या कम करने का गम्‍भीर षड्यंत्र है।

सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों के चलते अल्पसंख्‍यकों का झुकाव कांग्रेस की तरफ ही रहा जबकि हिन्दू राजनीतिक तौर पर बिखरा हुआ ही रहा। यही कारण रहा कि देश की सत्ता पर ऐसे लोग और दल काबिज हो जाते हैं जिन्हें हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और अपने देश के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति का ज्ञान ही नहीं होता। केन्द्र की सरकारों ने भारत विरोधी तत्वों को खुद इस देश में पनाह दी। भारत में 6 करोड़ बंगलादेशी घुसपैठिये देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं। उन्होंने सरकारी सहयोग से अपनी सम्‍पत्तियां बना ली हैं। हिन्दुओं के धर्मस्थलों और शक्तिपीठों का सरकारीकरण किया जा रहा है, लेकिन दूसरों के धर्मस्थलों पर कोई नियंत्रण नहीं। सरकारी खजाने से अल्पसंख्‍यकों के धार्मिकस्थलों के रखरखाव पर खर्च होता है।

सरकार की नीतियों को लेकर अदालतों का दृष्टिकोण काफी कड़ा रहा है। सच्चर कमेटी की सिफारिशों को न लागू करने के संबंध में केन्द्र सरकार के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार के वकील को कड़ी फटकार लगाई है। उसने पूछा है कि आप गरीबी से लडऩा चाहते हैं तो फिर धर्म आड़े क्‍यों आ रहा है? क्‍या यह समुदाय विशेष का तुष्टीकरण करने का प्रयास तो नहीं है? क्‍या यह कमेटी इसी काम के लिए बनी है? क्‍या सरकार को सबकी भलाई के लिए पैसा खर्च करना चाहिए या किसी एक समुदाय विशेष के उत्थान के लिए। आखिर 90 मुस्लिम बहुल जिले चिन्हित कर उनमें मुस्लिमों की तरक्की के ही विशेष प्रयास क्‍यों किए गए हैं? सरकार केवल अल्पसंख्‍यकों के उत्थान के लिए कटिबद्ध है, बहुसंख्‍यकों के लिए क्‍यों नहीं? आप अंग्रेजों की तरह 'बांटो और राज करो' के सिद्धांत पर क्‍यों चलना चाहते हैं?(क्रमश:)

Saturday, November 12, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (9)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(9)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 09-11-2011

अंग्रेजों के शासनकाल में 1871 में विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी का गठन अंग्रेजों ने मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए किया था। हंटर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए तत्कालीन भारतीय राज्य और हिन्दुओं को दोषी ठहराया था। जिस प्रकार हंटर कमेटी की सिफारिशों के गर्भ में अलगाववाद का बच्चा पलता रहा। वह बच्चा आज बड़ा हो चुका है।

मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाकर मुसलमानों के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का अध्ययन करवाया। सच्चर कमेटी ने जो सिफारिशें कीं वस्तुत: वह तुष्टीकरण का पुलिंदा मात्र हैं। सच्चर कमेटी ने यह भी सिफारिश की कि मुस्लिम बहुल चुनाव क्षेत्र मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं। यदि ऐसे निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित हैं तो उन्हें भी रद्द कर दिया जाए। सरकार ने भी सच्चर कमेटी की सिफारिशों को यथावत लागू करने की बात मान ली। इस पर संसद में न तो बहस कराई गई न ही कोई कार्यवाही रिपोर्ट (एटीआर) पेश की गई। आखिर सरकार को जल्दी किस बात की थी, जबकि रिपोर्ट में मुसलमानों के पिछड़ेपन का मुख्‍य कारण जनसंख्‍या वृद्धि तथा शिक्षा की उपेक्षा का उल्लेख तक नहीं किया गया। मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण सब जानते हैं। इस देश में जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद पर रहे। मोहसिना किदवई, नजमा हेपतुल्ला और अनेक मुस्लिम महिलाएं उच्च पदों पर रहीं। सलमान खुर्शीद, फारूक अब्‍दुल्ला और कई अन्य मुस्लिम मंत्री देश की सेवा कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यही मनमोहन सरकार का एजैंडा है, जो सच्चर कमेटी की सिफारिशों के रूप में सामने आया है।

सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में क्‍या कहा, जरा उस पर भी नजर डालें- कमेटी ने कहा है कि मुसलमान अपने को सर्वत्र असुरक्षित महसूस करता है। नकाबपोश मुस्लिम महिलाओं तथा दाढ़ी और टोपी वाले मुसलमानों को बहुसंख्‍यक हिन्दू जनता घृणा और संदेह की दृष्टि से देखती है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अल्पसंख्‍यकों के साथ अत्याचार करते हैं। मुसलमानों के साथ पूरी मशीनरी धार्मिकभेदभाव करती है। नौकरियों के चयन में मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है। वोटर लिस्ट से जानबूझकर सरकारी मशीनरी मुसलमानों के नाम काट देती है। प्राथमिक स्तर पर उर्दू को प्रोत्साहन न मिलने से नवोदय की परीक्षा में मुसलमान बच्चे प्रवेश नहीं पाते हैं। इतनी शिकायतें दर्ज कराने के साथ ही मुस्लिमों की बदहाली दूर करने के लिए सच्चर ने जो सुझाव दिए हैं वे भी कम हास्यास्पद नहीं हैं। उनके अनुसार इस्लाम में ब्‍याज का लेना या देना हराम है इसलिए बैंकों को मुस्लिमों के लिए अपनी व्यवस्था बदलनी चाहिए। जिले की सभी कल्याणकारी योजनाओं का एक निश्चित भाग मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिया जाए तथा इसके क्रियान्वयन के लिए मुसलमानों की एक कमेटी बना दी जाए। मदरसा शिक्षा बोर्ड को सीबीएसई के समान मान्यता दी जाए, जिसमें मदरसों की आधारभूत सुविधाओं तथा शिक्षकों का पूरा खर्च केन्द्र सरकार उठाए किन्तु शिक्षकों की नियुक्ति और पाठ्यक्रम निर्धारण में उसका कोई हस्तक्षेप न हो।

श्री किदवई, श्री हाशमी और श्री कुरैशी तथा जावेद हुसैन संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे हैं। उन्होंने तो कभी मुसलमानों से भेदभाव की शिकायत नहीं की। सच तो यह है कि जिन मुसलमानों ने ऊंचे ओहदे सम्‍भाले वे काफी उच्च शिक्षा प्राप्त रहे। आश्चर्य होता है कि सच्चर कमेटी को इस लोकतंत्र की खासियत नजर नहीं आई, बल्कि उन्हें शिकायतें ही नजर आईं। पुलिस सेवा, नौकरशाही, लोकसेवा आयोग, अस्पताल,चिकित्सक तथा शिक्षा जगत में भी मुस्लिम उच्च पदों पर रहे तो हिन्दुओं द्वारा उनसे भेदभाव करने की बात को सच नहीं माना जा सकता। (क्रमश:)

Friday, November 11, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (8)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(8)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 08-11-2011

संविधान की आत्मा को पहचानने वाले, बड़े संविधानविदों का कहना है कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्‍द की जरूरत नहीं थी, यह संविधान की आत्मा में निहित भाव था, परन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी को मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ऐसा करना पड़ा। श्रीमती गांधी ने ऐसा क्‍यों किया? लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्‍द के साथ धर्म भी जुड़ा है अत: आइए बिना पूर्वाग्रह के इस ओर राष्ट्र के हित में एकदृष्टि डालें।

आज सारे विश्व के नीतिज्ञ इस बात को मानते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रीकृष्ण से बड़ा राजनीति का जानकार कोई दूसरा नहीं था। विद्वानों की इस धारणा के बाद दूसरा नम्‍बर आता है कौटिल्य का और शेष आधे में विश्व के सभी राजनीतिज्ञ समेटे जा सकते हैं।

बस केवल ढाई राजनीतिज्ञ ही इस पृथ्वी पर हुए हैं। श्री कृष्ण ने विषम से विषम परिस्थिति में यह नहीं कहा कि मैं इस पृथ्वी पर 'राजनीति' की स्थापना करने को अवतरित हुआ। उनका स्पष्ट उद्घोष है-

''धर्मसंस्थापनार्थाय सम्‍भवामि युगे-युगे''

मैं बार-बार आता हूं ताकि धर्म की स्थापना हो सके।

इस धर्म में एक बात और छिपी है-

''साधुओं का त्राण और दुष्टों का नाश''

दूसरी बात जो आज विचारणीय है और सनातन वाङ्गमय के हर आराधक को जाननी होगी वह है भगवान के ये वचन कि 'अपने धर्म में रहकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है, पर दूसरों का धर्म विनाशकारी है, वह भयावह है।'' यह उक्ति विश्व के सबसे बड़े नीतिज्ञ की है। क्‍या यहां भगवान कृष्ण को हम साम्‍प्रदायिक कहें और अपनी ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर उन्हें नकार दें। क्‍या यह उचित होगा?

थोड़ा सा इस बात को इसलिए समझना होगा क्‍योंकि भारत में जो कानून बनते हैं, उनका सबसे बड़ा स्रोत धर्म है। 'स्वधर्म' की बात भगवान इसलिए करते हैं क्‍योंकि जन्म के साथ ही मनुष्य के संस्कार एक विशेष दिशा में बनने शुरू हो जाते हैं और उसी के अनुसार उसकी श्रद्धा का निर्माण होता है।

एक विशुद्ध आर्यसमाजी परिवार का उदाहरण लें। उस परिवार में उत्पन्न बालक को वेदों में अगाध निष्ठा होगी, वह एक ही ईश्वर को मानने वाला होगा, स्वामी दयानंद के विचारों पर आस्था रखने वाला होगा, स्पष्टवादी होगा। अगर ऐसे किसी युवक को आप यह कहें कि, ''तुम कल से पांचों वक्‍त नमाज पढऩी शुरू कर दो'' तो यह उसके लिए विनाशकारी कृत्य हो जाएगा। हो सकता है वह विक्षिप्त हो जाए। ऐसा ही किसी आस्थावान मुस्लिम को यह कहें कि वह रोज सत्यनारायण की कथा घर पर करवाए तो उसकी क्‍या हालत होगी? वह असहज हो जाएगा।

ऐसी बात नहीं कि इनके मन में कोई द्वेष है, बात यह है कि यह स्वधर्म के विरुद्ध है। वेदवाणी है कि केवल स्थित प्रज्ञ या ब्रह्मज्ञान को प्राप्त व्यक्ति की दृष्टि ही ऐसी हो सकती है। भगवान कहते हैं, ''पर धर्मो भयावह:।'' ऐसे लोग जो यह दिखावा करते हैं कि वह सारे धर्मों को एक ही दृष्टि से देखते हैं, या तो वह ब्रह्मज्ञानी हैं या पहले दर्जे के बेईमान व धूर्त्त 'धर्मनिरपेक्ष' कौन है इसका फैसला आप स्वयं करें। किसी धर्म का अपमान न करो, विवेकानंद कहते हैं, परन्तु अपना धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्मनिरपेक्ष शब्‍द बड़ा भयावह है, क्‍योंकि इसे तथाकथित राजनीतिज्ञ अस्तित्व में लाए हैं इससे बचना होगा। यह प्राणघातक है।

धर्मनिरपेक्षता, देश की एकता, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सौहार्द की दुहाई राजनीतिक दल और उनके नेता दे रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्हें धर्म, देश, राष्ट्र की न तो जानकारी है और न ही चिंता। कांग्रेस,कम्‍युनिस्टों, तीसरे और चौथे मोर्चे के नेता और अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसा कर रहे हैं। आजादी के बाद से ही मजहबी संकीर्णता, जातिवाद और क्षेत्रवाद जितना इन्होंने फैलाया है उतना किसी ने नहीं फैलाया। अल्पसंख्‍यकों के वोट थोक में बटोरने के लिए बहुसंख्‍यक हिन्दुओं की आस्थाओं पर लगातार आघात करना और राष्ट्रीय अस्मिता पर प्रहार करना इनकी आदत बन चुका है। जो कुछ आज हो रहा है उसकी शुरूआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी, जिसकी चर्चा मैं कल करूंगा। (क्रमश:)

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...