
Friday, July 16, 2010
महंगाई डायन खाय जात है...

Monday, July 12, 2010
Monday, June 21, 2010
पानी का षडयंत्र

आपने कभी सोचा की दिल्ली में पानी की इतनी किल्लत क्यों है, कहीं ये सब कुछ किसी षडियंत्र के तहत तो नहीं हो रहा है-
- क्यों आज दिल्ली में पेट से संबंधित रोगों से पीडि़त लोगों की संख्या बढ़ रही है। हर किसी घर में कोई ना कोई व्यक्ति पेट की बीमारी से पीडि़त है।
- कहीं इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों के वाटर प्यूरीफायर मार्केट में बिकवाने के लिए तो जानबूझकर गंदा पानी घरों में सप्लाई नहीं किया जा रहा।
- कहीं इन बड़ी-बड़ी दवाईयों की कम्पनियों के दबाव में तो लोगों को गंदा पानी पीने के लिए विवश नहीं किया जा रहा ताकि लोग इस गंदे पानी को पीकर बीमार पड़ें और इन कम्पनियों की दवाईयां बिक सकें।
- कहीं ये सरकार जानबूझकर कर तो सीवर लाईन का पानी जानबूझकर पीने के पानी के साथ मिक्स नहीं करवा रही है। ताकि पानी का जल्द से जल्द व्यवसायिकरण करके दिल्ली जल बोर्ड को किसी प्राईवेट कम्पनी के हाथों बेच सके। क्योंकि याद रहे कि इससे पहले भी यह सब कुछ हो चुका है। दिल्ली विद्युत बोर्ड को प्राईवेट करने से पहले भी इसी प्रकार बिजली की कृत्रम कमी दिखाकर उसे प्राईवेट कम्पनी के हाथों बेक चुकी है। और आज तक हम उसको भुगत रहे हैं।
- तो हमें इस सरकार की नीयत से सावधान रहना चाहिए। क्योंकि देखने में तो यह जनता की सरकार है लेकिन इसका एक भी कार्य जनता की भलाई में नहीं उठा इसने हर जगह जनता को ठगा है।
Thursday, June 17, 2010
जम्मू-कश्मीर सरकार का हिंदुओं पर जजिया कर

- जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 1 जुलाई 2010 से माता वैष्णों देवी दर्शनों के लिए अपनी गाड़ियों से जाने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक कार पर 2000 रूपये व तीन दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन की दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
- इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।
- श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।
- इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।
- पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।
- सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।
- अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।
- केन्द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्दुस्तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हिन्दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।
- सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।
Wednesday, June 9, 2010
न्याय की त्रासदी

केस
रात्रि 2-3 दिसम्बर, 1984 भोपाल में स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल)
के संयंत्र से मिथाइल आइसोसायनेट गैस का रिसाव।
प्रभाव
लगभग 15 हजार लोग इस गैस की चपेट में आने के कारण तड़प-तड़प कर अपने प्राणों से हाथ धो बैठे। और लगभग 5 लाख लोग इस गैस के दुष्प्रभावों से प्रभावित हुए। इसके अलावा पशुधन और पेड़-पौधों का जो नुकसान हुआ उसका तो शायद आज तक कोई रिकार्ड भी नहीं बन पाया होगा। पेड़ों की सभी पत्तियां सूख कर झड़ गई। लगभग एक सप्ताह तक यह जहरीली गैस वहां के वातावरण में घुली रही और जो भी इसकी चपेट में आया उसे इसने अपना ग्रास बना लिया।
दोषी
वॉरेन एंडरसन, यूसीसी अध्यक्ष (फिलहाल भारत से भागा हुआ है)
केशव महेन्द्रा, अध्यक्ष
विजय गोखले, मैनेंजिंग डायरेक्टर
किशोर कामदार, वाइस प्रसीडेंट
जे. मुकुंद, वर्क्स मेनेजर
एस.पी. चौधरी, प्रॉडक्शन मेनेजर
के.वी. शेट्टी, प्लांट सुपरीटेंडेंट
एस.आई. कुरेशी, प्रॉडक्शन सहायक
आर.वी. रॉय चौधरी, सहायक वर्क्स मेनेजर (सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई)
एक तरह से कांग्रेस और कानून
परिणाम
लगभग 25 साल बाद इस त्रासदी का फैसला आया। 23 वर्षों तक सुनवाई चली, 19 जज बदले गए। और फैसले की घड़ी आई तो लोगों को मिली न्याय की एक ओर त्रासदी। इतने वर्षों की लड़ाई के बाद पीडि़तो ने अपने आप को कानून और सरकारी तंत्र के द्वारा अपने को ठगा हुआ सा पाया। दोषीयों को मात्र दो-दो वर्ष की कैद और एक लाख रूपए जुर्माने की मामूली सी सजा सुनाई गई। कम्पनी पर केवल 5 लाख रूपए का जुर्माना लगाया गया। जो कि पीडि़तो के जले पर नमक छिड़कने के बराबर था। इन दोषियों में भी एक कम्पनी का अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन हमारी नपुंसक सरकार के लचर रवैये के कारण अभी भी देश से भागा हुआ है। और नहीं लगता कि कभी वापस भी लाया जाएगा।
व्यथा
इस त्रासदी से पता चलता है कि इस देश में आम आदमी के लिए कोई कानून नहीं है, कोई सरकार नहीं है। ये केवल उद्योगपतियों और उच्च वर्गो के लिए ही है। 15000 लोगों की जान केवल 1 लाख रूपए और 2 वर्ष की कैद। किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं कहां है लोकतंत्र इस देश में गुण्डातंत्र है, नोटतंत्र है, वोटतंत्र और न जाने कौन-कौन से तंत्र है, सिर्फ लोकतंत्र ही नहीं है। जिसके पास ये सभी तंत्र हैं उसी का कानून है और उसी की ये सरकार है। शायद यही कारण है कि इस त्रासदी से पीडि़त लोगों को भी ये मालूम था कि फैसला क्या आने वाला है और उन्होंने खुलेआम कहा कि हमें ना इस सरकार पर कोई विश्वास है न ही इस नपुंसक कानून पर जो कि केवल लिखे हुए उन धाराओं को ही सब कुछ मानता है जिसका फायदा उठाकर गुनाहगार आसानी से बच निकलता है, और ऐशों आराम की जिंदगी जीता है। उसे प्रत्यक्ष लोगों का दर्द नहीं दिखता। उसे उस माता का दर्द नहीं दिखता जिसके सामने उसके पूरे परिवार ने दम तोड़ दिया। और खुद आज उसकी हालत ऐसी है कि ना उसके पास खाने के लिए दो जून की रोटी है और ना ईलाज कराने के लिए इतना पैसा। कितने ही परिवारों की तीन-तीन पीढि़यां इस त्रासदी का ग्रास बन गई हैं। जिस देश में कानून के नाम पर आम आदमी से ऐसा मजाक किया जाता हो तो सोचिए उस देश से क्या उम्मीद की जा सकती है। वाकई किसी ने सही कहा है कि ये देश तो केवल राम भरोसे चल रहा है। पूरी दुनिया आज भारत को धिक्कार रही है कि ये किस प्रकार का देश है जो कि अपने नागरिको को भी न्याय नहीं दिला सकता और विश्वशक्ति बनने का दंभ भरता है। बेकार है ये परमाणु सम्पन्नता।
अरे सत्ता के मद में चूर और गरीबों के खून में भीगों कर रोटी खाने वालों बस करो ये राजनीति का नंगा नाच नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब यही सताए हुए कुचली हुई आम जनता में से ही कोई चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह बनकर तुम्हें तुम्हारी करनी का फल देगा।
Saturday, June 5, 2010
भारत में उड़ा पहला वायुयान
1895 ई. में शिवकर बापू जी तलपदे ने उड़ाया था पहला विमान
महर्षि भरद्वाज द्वारा वर्णित विमानों में से एक 'मरुत्सखा' विमान का निर्माण 1895 ई. में 'बम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स' के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपदे, जो एक महान् वैदिक विद्वान् थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की पण्डिता थीं) की सहायता से विमान का एक मॉडल (नमूना) तैयार किया। फिर प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों के आधार पर एक 'मरुत्सखा' प्रकार के विमान का निर्माण किया। यह विकान एक चालकरहित विमान था। इसकी उड़ान का प्रदर्शन तलपदे जी ने बम्बई (मुम्बई) की चौपाटी पर तत्कालीन बड़ौदा नरेश सर सयाजी राव गायकवाड़ और बम्बई के प्रमुख नागरिक लालाजी नारायण के सामने किया था। विमान 1500 फुट की ऊंचाई के बाद इसका ऊपर उठना बंद हो जाता था। इस विमान को उन्होंने महादेव गोविंद रानडे को भी दिखलाया था। दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपदेजी की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। 17 सितम्बर, 1917 ई. को उनका स्वर्गवास हो जाने के बाद उस मॉडल विमान तथा सामग्री को उत्तराधिकारियों ने एक ब्रिटिश फर्म 'रैली ब्रदर्स' के हाथ बेच दिया।
'राइट ब्रदर्स' के काफी पहले वायुयान निर्माण कर उसे उड़ाकर दिखा देनेवाले तलपदे महोदय को 'आधुनिक विश्व का प्रथम विमान निर्माता' होने की मान्यता देश के स्वाधीन हो जाने के इतने वर्षों बाद भी नहीं दिलाई जा सकी, यह निश्चय ही अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे भी कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पाठ्य-पुस्तकों में शिवकर बापूजी तलपदे के बजाए 'राइट ब्रदर्स' (राइट बंधुओं) को ही अब भी प्रथम विमान निर्माता होने का श्रेय दिया जा रहा है, जो नितांत असत्य है।
संदर्भ:-
मातृवन्दना (वार्षिक विशेषांक), भारत की समृद्ध वैज्ञानिक परम्परा] f'keyk
Thursday, June 3, 2010
चीन के मोहताज हो जाएंगे भारत-बांग्लादेश

- चीन की तिब्बत में उग्र ब्रह्मपुत्र नदी के उद्गम पर त्सांगपो के नाम से प्रसिद्ध इस नदी का रास्ता बदलने की एक महत्वाकांक्षी योजना है। चीन ने नदी पर झांगमू पनबिजली परियोजना शुरू कर दी है। पूरी हो जाने पर इस विशाल बांध से चार करोड़ किलोवाट प्रति घंटे बिजली पैदा होगी, जो यांगत्से नदी पर दुनिया के सबसे बड़े थ्री गार्जिज बांध से पैदा होने वाली बिजली से दोगुनी होगी।
- पता चला है कि इस साल 16 मार्च को इस परियोजना का उद्घाटन हुआ और 2 अप्रैल से निर्माण भी शुरू हो गया। भारत और बांग्लादेश का इन खबरों से चिंतित होना स्वाभाविक है। माननीय विदेशमंत्री ने हाल ही में राज्यसभा में कहा, जब हम बीजिंग में मिले थे तो इस परियोजना की बात उठी थी। चीन ने आश्वासन दिया है कि बांधस्थल पर पानी की कतई बर्बादी नहीं होगी और इससे बहाव के हमारे निचले क्षेत्र पर कोई असर नहीं होगा।
- करीब चार साल पहले भी यह मुद्दा उठाया गया था, लेकिन तब चीन की एक सरकारी रिपोर्ट में इस दावे को खारिज करते हुए कहा गया था कि बांध का विचार अनावश्यक, अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक है। अब तो चीन ने बांध बन जाने पर भारत, नेपाल और बांग्लादेश को सस्ती दरों पर बिजली देने की पेशकश कर दी है।
- ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो हमारी आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं, क्योंकि नदी के बदले गए रास्ते से चीन गोबी मरुस्थल में स्थित अपने उत्तरपश्चिमी जि़नजियांग और गान्सू प्रांतों की सिंचाई कर सकेगा। मतलब यह कि भारत और बांग्लादेश को सूखे की स्थिति में और बरसात के मौसम में बाढ़ से बचाव के लिए चीन का मुंह ताकना होगा।
- इसका असर यह होगा कि दक्षिण एशिया के सर्वाधिक आबादी वाले हिस्सों में करोड़ों लोग मारे और बेघर हो जाएंगे। वैज्ञानिक लिहाज से बात करें तो सबसे पहले एक जलविज्ञान विशेषज्ञ जॉन होर्गन ने कहा था कि गोबी मरुस्थल का विस्तार रोकने के लिए चीन ब्रह्मपुत्र के पानी को उत्तर-पश्चिम ले जाना चाहता है।
- सरकारी तौर पर इनकार के बावजूद, इस मामले पर चीन में उच्चतम स्तर पर कार्रवाई चल रही है। उदाहरण के लिए, ज़रूरत पड़ने पर नदी के उद्गम के निकट भौतिक स्थानीय विशिष्टताओं और रूपरेखा को बदलने के लिए चीन सीमित परमाणु विस्फोट कर सकता है।
- चीन इस नदी के करीब 71.4 अरब घन मीटर प्रवाह में से करीब 40 अरब घन मीटर प्रवाह का रास्ता बदलने की सोच रहा है। इतने बड़े पैमाने पर नदी का रुख मोड़ने से भारत और बांग्लादेश जैसे देशों की खेती, मछली पकड़ने और दूसरी गतिविधियों की उम्मीदें खत्म हो जाएंगी, जहां 40 करोड़ लोगों की आजीविका नदियों के पानी पर निर्भर करती है।
- भारत को एक और बात समझनी होगी कि चीन में अगर किसी योजना का खाका तैयार किया जाता है, तो उस पर अमल किया ही जाता है। खास बात यह है कि ग्रेट बेंड, भूकंप की जबर्दस्त संभावना वाले इलाके में स्थित है। एक विशाल जलाशय और कुछ विस्फोटों से भूकंपों का नया सिलसिला शुरू हो सकता है, जो अगस्त 1950 के भूकंप से भी अधिक विनाशकारी साबित हो सकता है।
- अगर बीजिंग अपनी त्सांगपो योजना पर अमल करता है तो इसे दक्षिण एशिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा समझा जाएगा?


