Saturday, August 7, 2010

कश्मीर: समस्या और समाधान

कश्मीर घाटी एक बार फिर सुलग रही है। उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती या अन्य सेकुलरों के अनुसार इसका कारण है सेना की ज्यादती। उनकी राय है कि सेना को यदि स्थायी रूप से हटा दें, तो घाटी में स्थायी शांति हो जाएगी। मुख्यमंत्री तो बहुत समय से यह मांग कर रहे हैं; पर अब जब उनकी अपनी जान और सत्ता ही खतरे में पड़ गयी है, तो वे फिर से सेना, कर्फ्यू, वार्ता और राजनीतिक समाधान की भाषा बोल रहे हैं।

उमर का राजनीतिक समाधान का राग वही है, जो अलगाववादी और पाकिस्तान प्रेरित देशद्रोही नेता लम्बे समय से गाते आये हैं। यानि जो लोग 1947 या उसके बाद कभी भी पाकिस्तान चले गये, उन्हें सम्मान सहित वापस लाएं। उन्हें नागरिकता देकर उनकी सम्पत्ति वापस करें। जो घुसपैठिये, आतंकवादी और पत्थरबाज जेल में हैं, उन पर दया की जाए। युवकों को सरकारी नौकरियां दी जाएं.. आदि। एक बात जो ये नेता नहीं बोलते; पर इन सब मांगों में से स्वतः परिलक्षित होती है, वह यह कि बचे खुचे हिन्दुओं को भी घाटी से सदा के लिए निकाल दिया जाए।

कश्मीर समस्या वस्तुतः नेहरू के पाप और अपराधों का स्मारक है। दूसरे दृष्टिकोण से देखें, तो यह मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि की समस्या है। इसे समझने के लिए डा0 पीटर हैमंड द्वारा लिखित एक पुस्तक स्लेवरी, टेरेरिज्म एंड इस्लाम, दि हिस्टोरिकल रूट्स एंड कन्टैम्पेरेरी थ्रैट का अध्ययन बहुत उपयोगी है। इसके बारे में अंग्रेजी साप्ता0 उदय इंडिया (17.7.2010) ने बहुत रोचक विवरण प्रकाशित किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि जनसंख्या वृद्धि से मुस्लिम मानसिकता कैसी बदलती है ?

लेखक के अनुसार जिस देश में मुस्लिम जनसंख्या दो प्रतिशत से कम होती है, वहां वे शांतिप्रिय नागरिक बन कर रहते हैं। अमरीका (0.7 प्रति.), आस्टेªलिया (1.5 प्रति.), कनाडा (1.9 प्रति.), चीन (1.8 प्रति.), इटली (1.5प्रति.), नोर्वे (1.8 प्रति.) ऐसे ही देश हैं। चीन के जिन प्रान्तों में मुसलमान उपद्रव करते हैं, वहां उनकी संख्या इस प्रतिशत से बहुत अधिक होने से वहां उनकी मनोवृत्ति बदल जाती है।

मुस्लिम जनसंख्या दो से पांच प्रतिशत के बीच होने पर स्वयं को अलग समूह मानते हुए वे अन्य अल्पसंख्यकों को धर्मान्तरित करने लगते हैं। इसके लिए वे जेल और सड़क के गुंडों को अपने दल में भर्ती करते हैं। निम्न देशों में यह काम जारी है: डेनमार्क (2 प्रति.), जर्मनी (3.7 प्रति.), ब्रिटेन (2.7 प्रति.), स्पेन (4 प्रति.) तथा थाइलैंड (4.6 प्रति.)।

पांच प्रतिशत से अधिक होने पर वे विशेषाधिकार मांगते हैं। जैसे हलाल मांस बनाने, उसे केवल मुसलमानों द्वारा ही पकाने और बेचने की अनुमति। वे अपनी सघन बस्तियों में शरीया नियमों के अनुसार स्वशासन की मांग भी करते हैं। निम्न देशों का परिदृश्य यही बताता है। फ्रांस (8 प्रति.), फिलीपीन्स (5 प्रति.), स्वीडन (5 प्रति.),स्विटजरलैंड (4.3 प्रति.), नीदरलैंड (5.5 प्रति.), ट्रिनीडाड एवं टबागो (5.8 प्रति.)।

मुस्लिम जनसंख्या 10 प्रतिशत के निकट होने पर वे बार-बार अनुशासनहीनता, जरा सी बात पर दंगा तथा अन्य लोगों और शासन को धमकी देने लगते हैं। गुयाना (10 प्रति.), भारत (13.4 प्रति.), इसराइल (16 प्रति.), केन्या (10 प्रति.), रूस (15 प्रति.) आदि में उनके पैगम्बर की फिल्म, कार्टून आदि के नाम पर हुए उपद्रव यही बताते हैं।

20 प्रतिशत और उससे अधिक जनसंख्या होने पर प्रायः दंगों और छुटपुट हत्याओं का दौर चलने लगता है। जेहाद, आतंकवादी गिरोहों का गठन, अन्य धर्मस्थलों का विध्वंस जैसी गतिविधियां क्रमशः बढ़ने लगती हैं। इथोपिया (32.8 प्रति.) का उदाहरण ऐसा ही है। 40 प्रतिशत के बाद तो खुले हमले और नरसंहार प्रारम्भ हो जाता है। बोस्निया (40 प्रति.), चाड (53.1 प्रति.) तथा लेबनान (59.7 प्रति.) में यही हो रहा है।

60 प्रतिशत जनसंख्या होने पर इस्लामिक कानून शरीया को शस्त्र बनाकर अन्य धर्मावलम्बियों की हत्या आम बात हो जाती है। उन पर जजिया जैसे कर थोप दिये जाते हैं। यहां अल्बानिया (70 प्रति.), मलयेशिया (60.4प्रति.), कतर (77.5 प्रति.) तथा सूडान (70 प्रति.) का नाम उल्लेखनीय है।

80 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम जनसंख्या अन्य लोगों के लिए कहर बन जाती है। अब वे मुसलमानों की दया पर ही जीवित रह सकते हैं। शासन हाथ में होने से शासकीय शह पर जेहादी हमले हर दिन की बात हो जाती है। बांग्लादेश (83 प्रति.), इजिप्ट (90 प्रति.), गजा (98.7 प्रति.), इंडोनेशिया (86.1 प्रति.), ईरान (98 प्रति.), इराक (97 प्रति.), जोर्डन (92 प्रति.), मोरक्को (98.7 प्रति.), पाकिस्तान (97 प्रति.), फिलीस्तीन (99 प्रति.), सीरिया (90प्रति.), ताजिकिस्तान (90 प्रति.), तुर्की (99.8 प्रति.) तथा संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रति.) इसके उदाहरण हैं।

100 प्रतिशत जनसंख्या का अर्थ है दारुल इस्लाम की स्थापना। अफगानिस्तान, सऊदी अरब, सोमालिया, यमन आदि में मुस्लिम शासन होने के कारण उनका कानून चलता है। मदरसों में कुरान की ही शिक्षा दी जाती है। अन्य लोग यदि नौकरी आदि किसी कारण से वहां रहते भी हैं, तो उन्हें इस्लामी कानून ही मानना पड़ता है। इसके उल्लंघन पर उन्हें मृत्युदंड दिया जाता है।

इस विश्लेषण के बाद डा. पीटर हैमंड कहते हैं कि शत-प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या होने के बाद भी वहां शांति नहीं होती। क्योंकि अब वहां कट्टर और उदार मुसलमानों में खूनी संघर्ष छिड़ जाता है। भाई-भाई, पिता-पुत्र आदि ही आपस में लड़ने लगते हैं। कुल मिलाकर मुस्लिम विश्व की यही व्यथा कथा है।

अब इस कसौटी पर कश्मीर घाटी को रखकर देखें, तो तुरन्त ध्यान में आ जाएगा कि वहां की मूल समस्या क्या है ? पूरे भारत में मुस्लिम जनसंख्या भले ही 13.4 प्रतिशत हो; पर घाटी में तो 90 प्रतिशत मुसलमान ही हैं। हिन्दू बहुल जम्मू की अपेक्षा मुस्लिम बहुल कश्मीर से अधिक विधायक चुने जाते हैं, जो सब मुसलमान होते हैं। वहां मुख्यमंत्री सदा मुसलमान ही होता है। शासन-प्रशासन भी लगभग उनके हाथ में होने से जम्मू और लद्दाख की सदा उपेक्षा ही होती है। 1947 से यही कहानी चल रही है।

इस कहानी के मूल में नेहरू की मूर्खता, पाप और अपराध हैं। लेडी माउंटबेटन और शेख अब्दुल्ला से उनके संबंध अब सार्वजनिक हो चुके हैं। यदि कश्मीर का विलय भी नेहरू की बजाय सरदार पटेल के हाथ में होता, तो हैदराबाद और जूनागढ़ की तरह यहां भी समस्या हल हो चुकी होती; पर दुर्भाग्यवश इतिहास की घड़ी की सुइयों को लौटाया नहीं जा सकता। हां, उससे शिक्षा लेकर आगे का मार्ग प्रशस्त अवश्य किया जा सकता है।

दुनिया के कई देशों में ऐसी समस्याओं ने समय-समय पर सिर उठाया है। चीन, जापान, रूस, बर्मा, बुलगारिया,कम्पूचिया, स्पेन आदि ने इसे जैसे हल किया, वैसे ही न केवल कश्मीर वरन पूरे देश की मुस्लिम समस्या 1947में हल हो सकती थी। 1971 में बांग्लादेश विजय के बाद भी ऐसा माहौल बना था; पर हमारे सेक्यूलर शासकों ने वे सुअवसर गंवा दिये।

इस समस्या के निदान के दो पक्ष हैं। पहला तो अलगाववादियों का सख्ती से दमन। वह राजनेता हो या मजहबी नेता, वह युवा हो या वृद्ध, वह स्त्री हो या पुरुष; वह मूर्ख हो या बुद्धिजीवी; वह मुसलमान हो या हिन्दू; पर देश के विरोध में बोलने वाले को सदा के लिए जहन्नुम भेजने का साहस शासन को दिखाना होगा। ऐसे सौ-दो सौ लोगों को गोली मार कर उनकी लाश यदि चौराहे पर लटका दें, तो आधी समस्या एक सप्ताह में हल हो जाएगी। हम अब्राहम लिंकन को याद करें, जिन्होंने गृहयुद्ध स्वीकार किया; पर विभाजन नहीं। इस गृहयुद्ध में लाखों लोग मारे गये; पर देश बच गया। इसीलिए वे अमरीका में राष्ट्रपिता कहे जाते हैं।

समाधान का दूसरा पहलू है कश्मीर घाटी के जनसंख्या चरित्र को बदलना। यह प्रयोग भी दुनिया में कई देशों ने किया है। तिब्बत पर स्थायी कब्जे के लिए चीन यही कर रहा है। चीन के अन्य भागों से लाकर इतने चीनी वहां बसा दिये गये हैं कि तिब्बती अल्पसंख्यक हो गये हैं। ऐसे ही हमें भी पूरे भारत के हिन्दुओं को, नाममात्र के मूल्य पर खेतीहर जमीनें देकर घाटी में बसा देना चाहिए। पूर्व सैनिकों के साथ ही ऐसे लोगों को वहां भेजा जाए,जो स्वभाव से जुझारू और शस्त्रप्रेमी होते हैं। सिख, जाट, गूजर आदि ऐसी ही कौमें हैं। ऐसे दस लाख परिवार यदि घाटी में पहुंच जाएं, तो वे स्वयं ही अलगाववादियों से निबट लेंगे।

कुछ लोग इसके लिए अनुच्छेद 370 को बाधा बताते हैं; पर यह ध्यान रहे कि दवा रोग मिटाने के लिए होती है। यदि उससे नया रोग पैदा होने लगे, तो उसे फेंकना ही उचित है। यदि अनुच्छेद 370 घाटी को देश से अलग करने में सहायक हो रहा है, तो उसे वैध-अवैध किसी भी तरह समाप्त करना ही होगा। मुस्लिम वोटों के दलाल चाहे जो कहें; पर यदि कश्मीर ही भारत में नहीं रहा, तो इस आत्माहीन अनुच्छेद का क्या हम अचार डालेंगे ?

कश्मीर भारत का मुकुटमणि है। डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बलिदान देकर दो विधान, दो प्रधान और दो निशानके कलंक को मिटाया था। मेजर सोमनाथ शर्मा जैसे हजारों वीरों ने प्राण देकर पाकिस्तान से इसकी रक्षा की है। क्या उनका बलिदान हम व्यर्थ जाने देंगे ? अब वार्ता के नाटक का नहीं, निर्णायक कार्यवाही का समय है। इसमें जितना समय हमारे अदूरदर्शी राजनेता गंवा रहे हैं, कश्मीर उतना हाथ से निकल रहा है।

कहते हैं कि जो इतिहास से शिक्षा नहीं लेते, उनके लिए इतिहास स्वयं को दोहराता है। सारा देश पूछ रहा है कि क्या एक बार फिर हम इसी नियति की ओर बढ़ रहे हैं ?


साभार : विजय कुमार

Friday, July 16, 2010

महंगाई डायन खाय जात है...

लफ्जों से ज्‍यादा ये चित्र इस सरकार की और महंगाई की वास्‍तविकता को बयां करता है। इसको देखकर साफ हो जाता है कि कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ही इस महंगाई को बढाने के लिए जिम्‍मेदार है। और इसकी चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी की चुप्‍पी भी इस महंगाई को बढाने के पक्ष में दिखती है। क्‍यों आजतक उनका एक भी वक्‍तव्‍य महंगाई को काबू में करने के लिए लिए नहीं आया। इसका मतलब की कांग्रेस की अध्‍यक्षा ही इस महंगाई को बढाने के लिए वास्‍तविक जिम्‍मेदार है।

Monday, June 21, 2010

पानी का षडयंत्र

आपने कभी सोचा की दिल्‍ली में पानी की इतनी किल्‍लत क्‍यों है, कहीं ये सब कुछ किसी षडियंत्र के तहत तो नहीं हो रहा है-

  • क्‍यों आज दिल्‍ली में पेट से संबंधित रोगों से पीडि़त लोगों की संख्‍या बढ़ रही है। हर किसी घर में कोई ना कोई व्‍यक्ति पेट की बीमारी से पीडि़त है।

  • कहीं इन बड़ी-बड़ी कम्‍पनियों के वाटर प्‍यूरीफायर मार्केट में बिकवाने के लिए तो जानबूझकर गंदा पानी घरों में सप्‍लाई नहीं किया जा रहा।

  • कहीं इन बड़ी-बड़ी दवाईयों की कम्‍पनियों के दबाव में तो लोगों को गंदा पानी पीने के लिए विवश नहीं किया जा रहा ताकि लोग इस गंदे पानी को पीकर बीमार पड़ें और इन कम्‍पनियों की दवाईयां बिक सकें।

  • कहीं ये सरकार जानबूझकर कर तो सीवर लाईन का पानी जानबूझकर पीने के पानी के साथ मिक्‍स नहीं करवा रही है। ताकि पानी का जल्‍द से जल्‍द व्‍यवसायिकरण करके दिल्‍ली जल बोर्ड को किसी प्राईवेट कम्‍पनी के हाथों बेच सके। क्‍योंकि याद रहे कि इससे पहले भी यह सब कुछ हो चुका है। दिल्‍ली विद्युत बोर्ड को प्राईवेट करने से पहले भी इसी प्रकार बिजली की कृत्रम कमी दिखाकर उसे प्राईवेट कम्‍पनी के हाथों बेक चुकी है। और आज तक हम उसको भुगत रहे हैं।

  • तो हमें इस सरकार की नीयत से सावधान रहना चाहिए। क्‍योंकि देखने में तो यह जनता की सरकार है लेकिन इसका एक भी कार्य जनता की भलाई में नहीं उठा इसने हर जगह जनता को ठगा है।

Thursday, June 17, 2010

जम्‍मू-कश्‍मीर सरकार का हिंदुओं पर जजिया कर

  • जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 1 जुलाई 2010 से माता वैष्णों देवी दर्शनों के लिए अपनी गाड़ियों से जाने वाले श्रद्धालुओं की प्रत्येक कार पर 2000 रूपये व तीन दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन की दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।

  • इसी प्रकार बाबा अमरनाथ यात्रा पर अपनी गाड़ी से जाने वाले श्रद्धालुओं से 2000 रूपये एंट्री फीस और सात दिन के बाद 2000 रूपये प्रतिदिन दर से एंट्री फीस वसूल की जा रही है।

  • श्रद्धालुओं एवं लंगर संस्थाओं से तुगलकी फरमान जारी करके जजिया कर वसूल किया जा रहा है। जजिया रूपी टैक्स को 300 से बढ़ाकर सीधा 2300 कर दिया गया है, जो कि आठ गुना है।

  • इसी तरह से माता वैष्णो देवी व अमरनाथ यात्रियों को लेकर आने वाले वाहन पर भी 24 सौ रुपये टैक्स लगा दिया गया है।

  • पिछले कई सालों से लंगर लगाने वाले स्थल को भी कम कर दिया गया है, वहीं लंगर कमेटियों को अपने ही देश में पहचान पत्र लाजिमी कर दिया गया है। हिंदुओं को जलील करने की इससे घटिया कार्यवाही और क्या होगी कि अपने ही देश के एक हिस्से में प्रवेश के लिए वीजा फीस वसूली जा रही है, जिसकी राशि 25,000 रुपये है। जो कि दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है।

  • सरकार की दोगली वोट बैंक की राजनीति बेहद अफसोसजनक है। एक ओर जहां हज यात्रियों को सब्सिडी दी जा रही है। वहीं अपने ही देश में हिंदुओं से जजिया कर वसूला जा रहा है।

  • अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए देश के विभिन्न हिस्से से यहां आकर लोग लंगर लगाते हैं। इन्हें सहयोग करने के बजाए सरकार सिक्योरिटी मनी के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करा रही है। यह राशि उन्हें वापस नहीं की जाएगी।

  • केन्‍द्र सरकार की कमजोर नीतियों की वजह से आज हिन्‍दुस्‍तान में देश विरोधी ताकतें सक्रिय हो रही हैं, जिसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण जम्‍मू कश्‍मीर सरकार द्वारा हिन्‍दुओं पर लगाया गया जजिया कर है।

  • सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ही करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

Wednesday, June 9, 2010

न्‍याय की त्रासदी

केस

रात्रि 2-3 दिसम्‍बर, 1984 भोपाल में स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल)

के संयंत्र से मिथाइल आइसोसायनेट गैस का रिसाव।

प्रभाव

लगभग 15 हजार लोग इस गैस की चपेट में आने के कारण तड़प-तड़प कर अपने प्राणों से हाथ धो बैठे। और लगभग 5 लाख लोग इस गैस के दुष्‍प्रभावों से प्रभावित हुए। इसके अलावा पशुधन और पेड़-पौधों का जो नुकसान हुआ उसका तो शायद आज तक कोई रिकार्ड भी नहीं बन पाया होगा। पेड़ों की सभी पत्तियां सूख कर झड़ गई। लगभग एक सप्‍ताह तक यह जहरीली गैस वहां के वातावरण में घुली रही और जो भी इसकी चपेट में आया उसे इसने अपना ग्रास बना लिया।

दोषी

वॉरेन एंडरसन, यूसीसी अध्‍यक्ष (फिलहाल भारत से भागा हुआ है)

केशव महेन्‍द्रा, अध्‍यक्ष

विजय गोखले, मैनेंजिंग डायरेक्‍टर

किशोर कामदार, वाइस प्रसीडेंट

जे. मुकुंद, वर्क्‍स मेनेजर

एस.पी. चौधरी, प्रॉडक्‍शन मेनेजर

के.वी. शेट्टी, प्‍लांट सुपरीटेंडेंट

एस.आई. कुरेशी, प्रॉडक्‍शन सहायक

आर.वी. रॉय चौधरी, सहायक वर्क्‍स मेनेजर (सुनवाई के दौरान मृत्‍यु हो गई)

एक तरह से कांग्रेस और कानून

परिणाम

लगभग 25 साल बाद इस त्रासदी का फैसला आया। 23 वर्षों तक सुनवाई चली, 19 जज बदले गए। और फैसले की घड़ी आई तो लोगों को मिली न्‍याय की एक ओर त्रासदी। इतने वर्षों की लड़ाई के बाद पीडि़तो ने अपने आप को कानून और सरकारी तंत्र के द्वारा अपने को ठगा हुआ सा पाया। दोषीयों को मात्र दो-दो वर्ष की कैद और एक लाख रूपए जुर्माने की मामूली सी सजा सुनाई गई। कम्‍पनी पर केवल 5 लाख रूपए का जुर्माना लगाया गया। जो कि पीडि़तो के जले पर नमक छिड़कने के बराबर था। इन दोषियों में भी एक कम्‍पनी का अध्‍यक्ष वॉरेन एंडरसन हमारी नपुंसक सरकार के लचर रवैये के कारण अभी भी देश से भागा हुआ है। और नहीं लगता कि कभी वापस भी लाया जाएगा।

व्‍यथा

इस त्रासदी से पता चलता है कि इस देश में आम आदमी के लिए कोई कानून नहीं है, कोई सरकार नहीं है। ये केवल उद्योगपतियों और उच्‍च वर्गो के लिए ही है। 15000 लोगों की जान केवल 1 लाख रूपए और 2 वर्ष की कैद। किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं कहां है लोकतंत्र इस देश में गुण्‍डातंत्र है, नोटतंत्र है, वोटतंत्र और न जाने कौन-कौन से तंत्र है, सिर्फ लोकतंत्र ही नहीं है। जिसके पास ये सभी तंत्र हैं उसी का कानून है और उसी की ये सरकार है। शायद यही कारण है कि इस त्रासदी से पीडि़त लोगों को भी ये मालूम था कि फैसला क्‍या आने वाला है और उन्‍होंने खुलेआम कहा कि हमें ना इस सरकार पर कोई विश्‍वास है न ही इस नपुंसक कानून पर जो कि केवल लिखे हुए उन धाराओं को ही सब कुछ मानता है जिसका फायदा उठाकर गुनाहगार आसानी से बच निकलता है, और ऐशों आराम की जिंदगी जीता है। उसे प्रत्‍यक्ष लोगों का दर्द नहीं दिखता। उसे उस माता का दर्द नहीं दिखता जिसके सामने उसके पूरे परिवार ने दम तोड़ दिया। और खुद आज उसकी हालत ऐसी है कि ना उसके पास खाने के लिए दो जून की रोटी है और ना ईलाज कराने के लिए इतना पैसा। कितने ही परिवारों की तीन-तीन पीढि़यां इस त्रासदी का ग्रास बन गई हैं। जिस देश में कानून के नाम पर आम आदमी से ऐसा मजाक किया जाता हो तो सोचिए उस देश से क्‍या उम्‍मीद की जा सकती है। वाकई किसी ने सही कहा है कि ये देश तो केवल राम भरोसे चल रहा है। पूरी दुनिया आज भारत को धिक्‍कार रही है कि ये किस प्रकार का देश है जो कि अपने नागरिको को भी न्‍याय नहीं दिला सकता और विश्‍वशक्ति बनने का दंभ भरता है। बेकार है ये परमाणु सम्‍पन्‍नता।

अरे सत्ता के मद में चूर और गरीबों के खून में भीगों कर रोटी खाने वालों बस करो ये राजनीति का नंगा नाच नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब यही सताए हुए कुचली हुई आम जनता में से ही कोई चन्‍द्रशेखर आजाद और भगत सिंह बनकर तुम्‍हें तुम्‍हारी करनी का फल देगा।

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...