Saturday, May 28, 2011

मत भूलो क्रांतिवीरों को

मत भूलो क्रांतिवीरों को


वीर स्वातंत्र्य सावरकर जयंती 27 मई


जो जाति अपने अतित को भूल जाती है, उसका विनाश निश्चित है। और वर्तमान परिवेश में हिन्‍दुओं की स्थिति देखकर यही प्रतीत होता है कि ये अपने अतीत को भूलकर विनाश की तरफ अग्रसर हो रही है। अपने अतीत के किसी भी प्रसंग पर गौरवान्वित होना तो दूर उल्‍टे ये उसे उपहास का विषय मानकर उसकी घोर निंदा और घृणा करने लगे हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है कि अब ये हिन्‍दू और ये हिन्‍दुस्‍तान अपने नष्‍ट होने के कगार पर पहुंच रहा है। आज किसी नौजवान से पूछा तो उसका आदर्श कौन है तो वह सलमान, शाहरूख और सचिन को बताएगा कोई पूछे जरा इनसे की इन लोगों ने कौन सा महानता का कार्य किया जिससे हमारे देश का कुछ भला हुआ हो। खैर समय ही ऐसा आ गया है किसी को नसीहत भी नहीं दे सकते। क्‍योंकि किसीको इसकी जरूरत ही नहीं है सब आजकल बहुत समझदार हैं। निम्‍नलिखित पंजाब केसरी की संपादकी आज के समय में बहुत प्रासंगिक है आशा है आप लोगों को भी इसे पढ़कर कुछ प्रेरणा मिलेगी:-


''पूछेगा इतिहास] समझ लो दिल्ली वालो

क्लीब बने, मुंह आज ढांप कर सोने वालो

कर न सकेगी क्षमा, तुम्हें पीढ़ी आगामी

मिट न सकेगा दाग, नपुंसकता अनुगामी।^^

आज वीर सावरकर की जयंती है। बर्गर और पिज्जा खाने वाली नई पीढ़ी शायद ही वीर सावरकर के बारे में जानती हो। दूरदर्शन या अन्य टीवी चौनल भूल कर भी उनके नाम या उनकी महत्ता का बखान नहीं करते। इसके लिए व्यवस्था जितनी दोषी है उतने ही हम भी हैं। हमने अपने बच्चों को वीर सावरकर के बारे में कभी बताने का प्रयास ही नहीं किया। आज कुछ लोग वीर सावरकर के चित्र पर माल्यार्पण कर इतिश्री कर लेंगे या हिन्दू महासभा में पदों के लिए एक-दूसरे से भिड़ रहे लोग उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लें लेकिन यह इस राष्ट्र की विडम्बना है कि जिन लोगों ने सब सुविधाओं के साथ विशेष श्रेणियों में जेल यात्राएं कीं वे विश्व प्रसिद्ध नेता बन गए। परन्तु जिन्होंने अंडमान जेल की काल कोठरियों में अमानुषिक अत्याचार सहे, बैलों की जगह जुत कर कोल्हू चलाए वे राष्ट्र विरोधी और साम्प्रदायिक कहलाए। वीर सावरकर ब्रिटिश की मांद में जा धमके, उससे निर्भीकता से जा भिड़े, जिनके आग्नेय प्रवाह से परिपूर्ण भाषणों से अंग्रेज भयभीत हुआ उस सावरकर को ब्रिटिश सत्ता भक्त साबित करने और चरित्र हनन करने में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदारों और बुद्धिजीवियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इतिहास साक्षी है कि अंडमान की काल कोठरी में यम-यातनाएं झेलने वाले इस महामानव की काया भले ही जर्जर हो गई हो उनके दृढ़ संकल्प पर कोई आंच नहीं आई थी।

देशभक्त क्रांतिकारियों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 में जो सशस्त्र क्रांति की थी उसे अंग्रेजों ने गदर बताकर देशभक्त भारतीयों को भ्रमित करने की जो कुचेष्ठा की थी उसी भ्रम को तोडऩे के लिए वीर विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटेन में बैठकर 1857 का स्वतंत्रता संग्राम नाम का क्रांतिग्रंथ लिखा जिससे डरे हुए अंग्रेज ने छपने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। वीर सावरकर ने यह ग्रंथ 1907 में लिखा था। प्रतिबंध के बाद भी इसका अंग्रेजी अनुवाद हालैंड में छपा वहां से फ्रांस और भारत में भेजा गया। क्रांतिकारियों ने इसे गीता की तरह पढ़ा। इसका दूसरा संस्करण भीकाजी कामा, लाला हरदयाल आदि क्रांति वीरों ने छपवाया। तीसरा संस्करण सरदार भगत सिंह ने गुप्त रूप में छपवाया। यह ग्रंथ इतना लोकप्रिय था कि इसकी एक-एक प्रति तीन-तीन सौ रुपए में बिकी।

13 मार्च, 1910 को लंदन में विक्टोरिया स्टेशन पर वीर सावरकर को बंदी बना लिया गया। उनके बड़े भाई गणेश सावरकर को 1908 में देशभक्ति की कविता लिखने के कारण 9 जून, 1909 को आजीवन कारावास की सजा देकर काला पानी भेजा गया। छोटे भाई नारायण सावरकर को क्रांतिकारियों का साथी बताकर जेल में बंद कर दिया। जब इस घटना का जेल में बंद वीर सावरकर को पता लगा तब गर्व से बोले, ''इससे बड़ी गौरव की क्या बात होगी हम तीनों भाई भारत माता की आजादी के लिए तत्पर हैं।''

1 जुलाई, 1910 को ब्रिटेन से भारत लाने के लिए वीर सावरकर को समुद्री जहाज से कठोर पहरे के बीच अंग्रेज पुलिस लेकर चल पड़ी। 8 जुलाई, 1910 को वीर सावरकर स्वतंत्र भारत की जय बोल कर समुद्र में कूद पड़े। अंग्रेजों ने खूब गोलियां चलाईं पर निर्भय सावरकर फ्रांस की सीमा में पहुंच गए। फ्रांस की भूमि से सावरकर को गिरफ्तार किया तो इसका विरोध हुआ तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में केस चला पर फ्रांस और ब्रिटेन की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला। 30 जनवरी, 1911 को वीर जी को दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई तब वे हंस कर बोले चलो ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया।

उन्होंने भारत को हिन्द शब्द की परिभाषा दी। वीर सावरकर का सारा जीवन हिन्दुत्व को समर्पित था। अपनी पुस्तक हिन्दुत्व में हिन्दू कौन है? इसकी परिभाषा में यह श्लोक लिखा-

''आसिन्धु सिन्धुपर्यन्तायस्य भारतभूमिका।

पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।''

अर्थात् भारत भूमि के तीनों ओर के सिन्धुओं (समुद्रों) से लेकर हिमालय के शिखर से जहां से सिंधु नदी निकलती है वहां तक की भूमि जो पितृ (पूर्वजों) की भूमि है यानी जिनके पूर्वज भी इसी भूमि में पैदा हुए और जिसकी पुण्य भूमि यानी तीर्थ स्थान इसी भूमि में हैं वही हिन्दू होता है।

आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास में यथोचित स्थान ही नहीं दिया। स्वतंत्रता संग्राम में केवल गांधी और गांधीवादियों की ही भूमिका का विस्तृत उल्लेख किया। पंडित नेहरू तो इनसे इतने भयभीत थे कि देश का हिन्दू सावरकर को ही अपना नेता मान बैठेगा। गांधी जी की हत्या के मामले में नेहरू सरकार ने झूठे आरोप लगाकर उन्हें लालकिले में बंद कर दिया। बाद में न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया था।

वीर सावरकर के महाप्रयाण के बाद भी अटल सरकार के दौरान कांग्रेस ने संसद भवन में उनका चित्र लगाने पर विवाद खड़ा कर दिया था और 2001 में यूपीए सरकार के रहते मणिशंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गांधी के नाम का पत्थर लगा दिया था, जबकि गांधी वहां कभी गए ही नहीं थे। मेरे इस सम्पादकीय का प्रयोजन गांधी-नेहरू की आलोचना करना नहीं। उन्होंने अपने प्रकार से देश सेवा का ही उपक्रम किया है, लेकिन मेरी कलम यही कह रही है कि आजादी केवल गांधीवादियों की देन नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदानों के चलते ही मिली है। राष्ट्र सभी को समान सम्मान दे। कांग्रेस ने बहुत से कुटिल खेल खेले हैं, आज राष्ट्र को वीर सावरकर जैसे नेता की जरूरत है। अगर आज हमने बच्चों को वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों को इतिहास नहीं पढ़ाया तो भविष्य में कोई भी क्रांतिवीर नहीं होंगे।

स्रोत:- संपादकीय पंजाब केसरी

Tuesday, April 19, 2011

पाक में जबरन हिन्‍दुओं का धर्म परिवर्तन

स्रोत:- जागरण 19 अप्रैल, 2011

क्‍या इस समाचार के बाद कोई एक भी भारत का मानवाधिकार संगठन पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं पर हो रहे अत्‍याचारों पर एक शब्‍द भी बोलने की हिम्‍मत करेगा। कुछ दिनों पहले कोई एक बिनायक सेन के मानवाधिकारों को लेकर मीडिया से लेकर सड़क तक पर और विदेशों के नोबेल पुरस्‍कार विजेताओं की फौज खड़ी करने वाले तथाकथित अपने को धर्मनिरपेक्षता को सबसे बड़ा पेरोकार साबित करने वाले संगठनों में हौड लगी हुई थी। और ऐसा प्रचारित करने का प्रयास किया जा रहा था। जैसा कि अब भारत में लोकतंत्र नहीं, तानाशाही शासन व्‍यवस्‍था आ गई हो। परन्‍तु उस हिसाब से तो पाकिस्‍तान को हम किस श्रेष्‍णी में रखें। जहां, केवल हिन्‍दू होना ही कोई अपराध हो और उसे हीन द़ष्टि से देखा जाता है। और तरह-तरह के अत्‍याचार किये जाते हैं और जबरदस्‍ती इस्‍लाम कबूल करवाया जाता है। मैं पूछना चाहता हूं, उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों से क्‍या हिन्‍दू को जीने का अधिकार भी नहीं है। इस्‍लाम को शांति का मजहब घोषित करने वालों की बहुत तकरीरे होती हैं। तो मैं उनसे भी पूछना चाहूंगा कि क्‍या इसी प्रकार की शांति की बात करते हैं।

Saturday, April 16, 2011

पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं, सिखों की स्थिति दयनीय

अब हमारे देश के तथाकथित अल्‍पसंख्‍यकों के मानवाधिकार का दुखडा रोने वाले लोग और संगठन इनके बारे में क्‍या कहेंगे। क्‍या इसमें भी किसी हिन्‍दू संगठनों का हाथ है।

साभार:- पंजाब केसरी 16 अप्रैल, 2011


Monday, November 1, 2010

कांग्रेस का हिंदुओं के खिलाफ षड्यंत्र

‘‘ओ नवीन रहबरो, आग को हवा न दो
पीढिय़ों के दर्द की यह गलत दवा न दो
आपसी दुराव के सभी बयान रोक दो
देश बांटने की हर प्रवृत्ति को लगाम दो
द्वेषपूर्ण भाषणों की वृत्ति को विराम दो
यह प्रवृत्ति देश में नया विवाद लाएगी
और लग गई ये आग फिर न बुझने पाएगी।’’

जीवन में कभी-कभी अतीत में गहराई से झांकना बड़ा ही अच्छा लगता है और सुखद भी। भारतवर्ष में जिस तंत्र में हम रह रहे हैं और हम जिसे प्रजातंत्र कहते हैं वह आजादी के 6 दशक बाद कैसा सिद्ध हो रहा, इस पर मैं टिप्पणी करना चाहता हूं। मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान में हिन्दुत्व की बात करना या हिन्दू होना गुनाह हो गया है। हिन्दुओं के खिलाफ एक सुनियोजित षड्यंत्र रचा जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष नामक शब्‍द भारत के माथे पर कोढ़ बन कर उभरा है। यह आज भी इस राष्ट्र के लिए कलंक है। धर्म चेतना का विज्ञान है अत: यह हमेशा एक ही रहता है।
हिन्दू समाज को पहले पश्चिम के विद्वानों ने निशाना बनाया। धर्मनिरपेक्षता को हथियार बनाकर हिन्दुत्व के मान बिन्दुओं पर आघात पहुंचाया गया। महात्मा गांधी के जमाने से ही कांग्रेस तुष्टिकरण की नीतियों पर चल पड़ी थी, जो आज तक चल रही है। कम्‍युनिस्ट और अन्य दलों ने भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान, ईसाइयों को विशेषाधिकार दिए जाने की मांग शुरू कर दी। वोटों के लालच में इस शब्‍द का खुला दुरुपयोग किया जाने लगा। जब भी कभी हिन्दू हितों की बात की जाती है तो उन्हें साम्‍प्रदायिक करार दिया जाता है और धर्मनिरपेक्षता विरोधी बताकर खिलाफत की जाती है। इस तरह धर्मनिरपेक्ष शब्‍द को हिन्दू विरोध का पर्यायवाची बना डाला गया है। कांग्रेस आज इसका उत्तर दे सकती है कि क्‍या उसने ही मुस्लिमों के खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर कट्टरवाद और अलगाववाद को बढ़ावा नहीं दिया था? समस्याओं की तथ्यपरक समीक्षा का समुचित समाधान निकालने के विपरीत गांधी और नेहरू कल्पना लोक में विचरण करते रहे। वे हिन्दुओं को समझाते रहे कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं हैं। दोनों ही भारतीय राष्ट्र का अंग हैं, गांधी जी कहते रहे ‘‘हिन्दुस्तान का बंटवारा मेरी लाश पर ही हो सकता है।’’ नेहरू जी कहते रहे ‘‘पाकिस्तान एक वाहियात सपना है।’’
''राजेन्द्र बाबू ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया डिवाइडेड’ में लिखा ‘‘पाकिस्तान असम्‍भव है’’ यह मानने वाले नेताओं ने ही बंटवारा स्वीकार किया। शांति और अहिंसा का घूंट पिलाकर हिन्दुओं को निहत्था और कायर बनाया। उसके बाद भारत का गवर्नर जनरल माउंट बेटन को ही रहने दिया किन्तु पाक का गवर्नर जिन्ना को स्वीकार कर लिया। परिणामस्वरूप पाकिस्तानी पुलिस, सेना और दंगाइयों के संयुक्त अभियान में लाखों हिन्दू कत्ल कर दिए गए। हिन्दुओं की अपार सम्‍पत्ति छीन ली गई। असंख्‍य महिलाओं का बलात्कार और अपहरण हुआ तथा वहीं रह रहे सभी हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण हुआ।''
आजादी के बाद भी कांग्रेस और अन्य दलों ने सत्ता के लिए हमेशा हिन्दुवादी संगठनों को निशाना बनाया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या पंडित नेहरू का सौभाग्य कि उन्होंने भी उस समय तेजी से शक्तिशाली हो रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुचलने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की हत्या का घृणित आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। दिन-रात दुष्प्रचार कर जनता के मन में संघ के प्रति घृणा भर दी और इस तरह अपनी पार्टी और वंश का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या में संघ निर्दोष पाया गया और दो वर्ष बाद उससे प्रतिबंध हटा लिया गया। कई बार संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और हटाया गया। कांग्रेस आज भी पुराना खेल खेल रही है और तुष्टीकरण की नीतियों के चलते हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम ने पहले भगवा आतंकवाद शब्‍द का प्रयोग किया। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सिमी की तुलना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कर दी और फिर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह अनर्गल आरोप लगा दिया कि संघ की पाक की खुफिया एजैंसी आईएसआई से सांठगांठ है। पहले मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद संघ को निशाना बनाया गया जबकि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ‘अभिनव भारत’ का संघ से कोई संबंध ही नहीं है। अब राजस्थान पुलिस ने अजमेर बम धमाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार का नाम चार्जशीट में शामिल कर फिर षड्यंत्र का संकेत दे दिया है। इस षड्यंत्र के पीछे कांग्रेस की संकीर्ण राजनीतिक सोच नजर आ रही है। अभी इन्द्रेश कुमार के खिलाफ पुलिस के पास कोई पुख्‍ता सबूत नहीं है। जांच में क्‍या निकलता है, यह कहा नहीं जा सकता लेकिन क्‍या राहुल गांधी के वक्तव्य को सच साबित करने के लिए इन्द्रेश कुमार को निशाना तो नहीं बनाया गया? बिहार चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस मुस्लिम वोटों की खातिर किसी भी हद तक जा सकती है और जांच एजैंसियों का दुरुपयोग कर सकती है। यह उसका पुराना खेल भी रहा है। देशवासियो जानो कांग्रेस की असलियत को। सरकार की नाक के नीचे हुर्रियत नेता गिलानी और लेखिका अरुंधति राय कश्मीर की आजादी का राग अलापते हैं और उनके खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज करने से इन्कार कर दिया जाता है। जिहादी आतंकवाद और नक्‍सली हिंसा का दायरा बढ़ रहा है। कट्टरपंथी पाक का झंडा लहरा रहे हैं लेकिन कांग्रेस हिन्दू आतंक का ढिंढोरा पीट रही है। आर्य पुत्रो ऐसे षड्यंत्रों से सावधान रहो। खादीधारी मेमने बड़े खतरनाक हैं, उन्होंने आग लगाई तो हिन्दू जनमानस को संगठित होना ही होगा और हिन्दू राजनीति को स्वर देना ही होगा।


पंजाब केसरी सम्‍पादकी
1 नवम्‍बर, 2010

Saturday, October 30, 2010

ब्‍लू लाइन दिल्‍ली की असली लाईफ लाइन

किलर लाईन, नीला प्रेत, मौत की लाईन और न जाने कितने ही ऐसे नामो से ब्‍लू लाईन को मीडिया ने प्रचारित कर लोगों के मन में ऐसा भय पैदा किया कि वे भी उसे इन्‍हीं नामो से सम्‍बोधित करने लगे और इस धुर्त मीडिया की तोता रटन को ही सच मान कर इन बसो को बंद करवाने के लिए उतावले होने लगे। पर ये बेवकूफ लोग इनको क्‍या कहें ना तो इनको अपने अच्‍छे का पता है और न अपने बूरे का केवल पता है तो सिर्फ इतना की मीडिया ने जो कहा वो ही सच है। तो मान लो कि ये बसे केवल जान लेती हैं। सामने आते ही किसी को भी रौंद देती हैं। ये तो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। अगर ये इसी प्रकार चलती रही तो हमको भी मार देंगी। तो मिला दी इस धुर्त मीडिया की तान में तान और लगवा दिया इन बसों में ताला।

आखिर ये माजरा क्‍या है। आइए आपको बताते हैं, इन ब्‍लू लाईन बसों को 1980 के आरम्भ में दिल्‍ली की सड़को पर उतारा गया था। दिल्ली में उस दौरान डीटीसी बसों की हड़ताल के परिणामस्वरूप इन बसो को चलाया गया था जिसके कारण दिल्ली की गति थम गई थी। उस समय इनका रंग लाल था। इन बसो को चलाने से दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन में बहुत सुधार हुआ। और वर्तमान समय में ये दिल्‍ली की असली लाईफ लाईन बन चुकी हैं। और खासकर उस आम आदमी की सबसे ज्‍यादा जरूरत जिसके नाम पर हर पांच साल बाद ये राजनीति की रोटी सेकने वाले वोट मांगने उसकी चौखट पर जाते हैं और चुनाव समाप्‍त होने के बाद उस आम आदमी को भूल जाते हैं। जिनके पास दो वक्‍त की रोटी का जुगाड़ करने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं होता।

आम आदमी मोटी-मोटी रकम देकर आटो या टैक्‍सी में सफर नहीं कर सकता। जिनकी जान का वास्‍ता देकर इन बसों को बंद किया गया है। आज वह आम आदमी ही सबसे ज्‍यादा इन बसों के सड़कों पर न उतरने से परेशान हो रहा है। घंटों बस स्‍टॉप पर खड़े होने के बाद भी इन डीटीसी बसों का कोई माई-बाप नहीं है। कब ये बसे आती हैं और कब नहीं। आती भी हैं तो उनकी हालत देखकर इस आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं। कि आखिर इसमें चढे़ की ना चढ़े परन्‍तु पूरे दिन का थका मांदा वो हिम्‍मत करके सांस रोक कर अपनी जिंदगी को हाथ में रखकर उस पर चढ़ जाता है। उसके बाद भगवान ही उसका मालिक होता है।

जिस मैट्रो का नाम और भरोसे को लेकर इन बसो को सड़कों से हटाया गया है। आज उसकी हालत खुद खस्‍ता हो चुकी है। किस स्‍टेशन पर कितनी देर रूकेगी अथवा बीच रास्‍ते में कभी भी किसी भी जगह रूक जाती है। जिसके चलते हजारो लोगों की जान पर आ बनती हैं। अव्‍यवस्‍था का आलम यह है कि किसी-किसी स्‍टेशन पर तो सूचना देने के लिए कोई अधिकारी भी नहीं होता। मैट्रो वाले केवल तकनीकी खराबी बताकर अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं। इस अव्‍यवस्‍था का नजारा कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के दौरान भी लोगों को खूब देखने को मिला। जब जहां तहां कहीं भी ये मैट्रो बीच टनल में रूक गई। दो ढाई मिनट में मैट्रों की फ्रिक्‍वंसी देने का वादा करने करने वाली ये डीएमआरसी आज कई स्‍टेशनों पर 15 से 20 मिनट में भी सेवा उपलब्‍ध नहीं करवा पा रही है। जिसके चलते स्‍टेशनों पर भारी भीड़ हो जाती है जिसको कंट्रोल करने के लिए उसके पास कोई व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध नहीं है। जिसके चलते लोग धक्‍का-मुक्‍की पर उतारू हो जाते हैं। और ये धक्‍का-मुक्‍की कई बार लड़ाई झगड़ों में भी बदल जाती है। गाली-गलोच होना तो आम बात हो गई है। और इन सबमें सबसे ज्‍यादा परेशानी महिलाओं बच्‍चों और विकलांग व्‍यक्तियों को होती है जो कि इन सबसे टक्‍कर नहीं ले पाते। मैट्रो स्‍टेशनों पर एकत्रित बेतहाशा भीड़ को देखकर डीएमआरसी वालों के भी पसीने छूट जाते हैं। और कितनी ही बार उनको ये अनाउंसमेंट करनी पड़ती है‍ कि यदि यात्रियों को अधिक जल्‍दी है तो वे किसी दूसरे विकल्‍प का प्रयोग करें। इतना महंगा किराया देने के बाद भी आम लोगों को केवल असुविधा ही मिल रही है।

और रही बात इस भोपू मीडिया की तो उसके लिए तो इसमें भी अपनी टीआरपी बढ़ाने की होड़ लगी रहती है। ब्‍लू लाईन को निपटाने के प्रयास में सफल होने के बाद अब मैट्रो को भी गाली देने से पीछे नहीं हटते। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसकी हैडिंग होती है एक बार फिर परेशानी का सबब बनी मैट्रो, फिर थमी दिल्‍ली की लाईफ लाईन आदि। लेकिन इसमें गलती इस मीडिया की नहीं है। उनके लिए तो केवल यह व्‍यवसाय है। इनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की किसकी लाईफ लाईन रूकी या चली।

मुझे तो इसमें भी इस सरकार की किसी बड़ी कम्‍पनी से सांठगांठ की बू आ रही है। इतने लोगों के पेट पर लात मारने के पीछे किसी बड़ी कम्‍पनी के साथ कोई अंदरूनी गठबंधन हो सकता है। ये तो आने वाले समय में ही साफ हो सकेगा। क्‍योंकि ये सरकार एक जगह जहां धीरे-धीरे करके सभी सरकारी महकमों का नीजीकरण करने पर उतारू है वहीं दूसरी तरफ लोगों की जिंदगी से उसको इतनी हमदर्दी कहां से हो गई कि एक ही झटके में सारी व्‍यवस्‍था अपने हाथों में ले ली है। इस सरकार की ईमानदारी से हम अच्‍छी तरह से वाकिफ हैं। किस तरह पहले बिजली का नीजिकरण करके आज आम जनता को रिलायंस कम्‍पनी के साथ मिलकर जिस तरह से लूटा जा रहा है। उसके बाद जल बोर्ड का भी निजीकरण करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। अब डीटीसी की आड़ लेकर किसी कम्‍पनी के साथ करार किया है। ये जानने की बात है। वो भी आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

इसके पूर्व हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि जब मामला पहले से ही कोर्ट में है तो बिना कोर्ट को संज्ञान में रखे हुये नोटिफिकेशन क्यों जारी किया गया। हाईकोर्ट ने शिला सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा कि जब तक यातायात के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जाते तब तक साउथ दिल्ली के सभी रूटों पर ब्लूलाइन बसें बहाल की जाए। दूसरी तरफ, ब्लूलाइन ऑपरेटरों का कहना है कि सरकार ने उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हटने के लिए कहा, तो वे हट गए लेकिन सरकार को भी उनके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक सोचना चाहिए क्योंकि बसें हटने से हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...