Monday, November 21, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (16)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (16)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक 16-11-2011

आजादी के बाद भी कांग्रेस और अन्य दलों ने सत्ता के लिए हमेशा हिन्दुवादी संगठनों को निशाना बनाया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या पंडित नेहरू का सौभाग्य कि उन्होंने भी उस समय तेजी से शक्तिशाली हो रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुचलने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की हत्या का घृणित आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। दिन-रात दुष्प्रचार कर जनता के मन में संघ के प्रति घृणा भर दी और इस तरह अपनी पार्टी और वंश का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या में संघ निर्दोष पाया गया और दो वर्ष बाद उससे प्रतिबंध हटा लिया गया। कई बार संघ पर प्रतिबंध लगाया और हटाया गया। कांग्रेस आज भी पुराना खेल खेल रही है और तुष्टीकरण की नीतियों के चलते हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। वर्तमान में यह भूमिका चिदम्‍बरम व दिग्गी राजा निभा रहे हैं। हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म को अपमानित किया जाता है जबकि हिन्दू धर्म किसी दूसरे धर्म का अपमान नहीं करता। इस पर मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है।

''सर्वपल्ली राधाकृष्णन जब एक छोटे ईसाई स्कूल में पढ़ते थे तभी से हिन्दू धर्म के प्रति ईसाई अध्यापकों के द्वेषपूर्ण उद्गारों को सुनते आए थे। स्कूल में लडक़ों को 'बाइबल' तो पढ़ाई ही जाती थी पर बात-बात में हिन्दू धर्म की हंसी उड़ाना भी ईसाई पादरियों का नित्यकर्म बन गया था। बालक राधाकृष्णन को यह बुरा तो लगता था पर धर्म के रहस्यों से अनजान होने के कारण वे अधिक बोल नहीं सकते थे। फिर भी इन बातों से उनका मन धर्म के स्वरूप की तरफ आकर्षित हो गया और वे इस विषय की पुस्तकों को पढक़र उन पर विचार करने लगे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें पढ़ीं और उनसे उनको निश्चय हो गया कि हिन्दू धर्म ईसाई धर्म की अपेक्षा अधिक सारयुक्त और उपयुक्त है। अब वे ईसाई पादरियों की बातें सुनकर चुप नहीं रहते थे, वरन् कभी-कभी अपना असंतोष भी प्रकट कर देते थे।

वे ईसाई धर्म की निंदा नहीं करते थे, वरन् पादरियों की द्वेषदर्शी मनोवृत्ति की ही आलोचना करते थे। जब कोई पादरी उनके सामने हिन्दू धर्म की निंदा करता तो वे कहने लगते-'पादरी महोदय! आपका धर्म दूसरे धर्मों की निंदा करना ही सिखाता है क्‍या?'

पादरी उत्तर देते- 'और हिन्दू धर्म? क्‍या दूसरों की प्रशंसा करता है? 'हां, वह कभी दूसरों के धर्म को बुरा नहीं कहता। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने यही कहा है कि किसी भी देव की उपासना करने से मेरी ही उपासना होती है और मैं उसका प्रतिफल देता हूं। ये विभिन्न मजहब और सम्‍प्रदाय उन अनेकरास्तों की तरह हैं जो विभिन्न दिशाओं से आकर एक ही केन्द्र पर मिल जाते हैं। इनमें से किसी को सच्चा और अन्यों को झूठा कहना उचित नहीं।'

जब कभी कोई पादरी हिन्दू रीति-रिवाजों की आलोचना करता तो वे कहते-

'पादरी साहब! हो सकता है आप हमारे इन रीति-रिवाजों का महत्व न समझें, किन्तु चिरकाल से चली आ रही इन्हीं प्रथाओं ने हमारे विश्वास और श्रद्धा को स्थिर रखा है, जो धर्म का मूल है। मेरे देश का एक साधारण किसान भी, जो इन्हीं विश्वासों के साथ अपना जीवनयापन करता है, आज के विज्ञान की चकाचौंध से पागल बने किसी भी पाश्चात्य देश के अपने को ज्ञान सम्‍पन्न कहने वाले व्यक्ति से अधिकधार्मिक है। अधकचरे विज्ञान ने तो आज करोड़ों पाश्चात्यजनों की श्रद्धा को ऐसा निर्बल बना दिया है कि वे किसी भी धर्म के विश्वासी और अनुयायी नहीं रह पाते। इस प्रकार धर्म बल से रहित व्यक्ति क्‍या कभी सच्चा सुख पा सकता है? आप निश्चय समझ लें कि भारतवर्ष के जिन तपस्वियों और आचार्यों ने संसार को ऐसी महान संस्कृति दी और उसका लाभ बिना धर्म और सम्‍प्रदाय के भेदभाव के मानव मात्र को पहुंचाया, उनको कभी धर्म शून्य नहीं कहा जा सकता?' (क्रमश:)

Friday, November 18, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (15)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (15)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 15-11-2011

महान राष्ट्रवादी चिन्तक और विचारक वीर सावरकर ने क्‍या कहा था, इस पर विचार करना जरूरी है, उनकी कही बातें एक-एक करके सच हो रही हैं।

4 जून 1947 को वीर सावरकर ने कहा कि नेहरू का यह कथन गलत सिद्ध होगा कि भारत विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का सदा के लिए समाधान हो जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समाधान के रूप में देश को खंड-खंड करने वालों को मैं चेतावनी देता हूं कि देश के बंटवारे से यह समस्या सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझ जाएगी, क्‍योंकि यह प्रश्र दो जातियों का नहीं है। पाकिस्तान की स्थापना होते ही समस्या बढ़ेगी। अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से बोलते हुए वीर सावरकर ने 1937 में कहा था कि हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वंदेमातरम का विरोध कर रहे हैं कल हिन्दुस्तान और भारत नामों पर एतराज करेंगे। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को दारूल इस्लाम बनाना है। तुष्टीकरण की नीति से उनकी भूख और बढ़ती जाएगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना पड़ेगा। 7 अक्तूबर, 1944 को अखंड भारत सम्‍मेलन में वीर जी ने कहा था कि ''भारत को खंडित करके पाकिस्तान बनाने की मांग करके मुस्लिम लीग ने समस्त हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती दी है। कांग्रेसी नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की आत्मघाती नीति के कारण देश को खंड-खंड, अंग-भंग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। देश के प्रत्येक हिन्दू को अपने राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए सर्वस्व होम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

यदि उस समय वीर सावरकर की बात मानी जाती तो देश के बंटवारे का दु:ख नहीं भोगना पड़ता, परंतु कांग्रेस और गांधी जी की तुष्टीकरण की क्रियाओं ने हिन्दुओं के स्वाभिमान को समाप्त कर दिया। इस कार्य में गांधी जी के बाद में गीता पहले कुरान पढऩा ईश्वर, अल्ला तेरो नाम गाने से हिन्दुओं की मानसिक दृढ़ता निर्बल हुई और पाकिस्तान बन गया। जो वीर सावरकर ने कहा था अक्षरश: सत्य सिद्ध हुआ। बंटवारे से समस्या कम न होकर और बढ़ गई। आज फिर तुष्टीकरण का वही खेल गांधी की कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में खेल रही है। यदि वीर सावरकर की कही हुई बात हम आज भी मान लें तो भारत भावी दुर्दशा से बच सकता है। अब तो पाकिस्तान के आतंकी और भारत में छुपे हुए पाक-बंगलादेशी घुसपैठिए, अमरीका की नीति और कांग्रेस का तुष्टीकरण ये चार प्रकार के संकट देश पर आते हुए स्पष्ट दिख रहे हैं। इसमें धरती, आकाश, पहाड़, नदियां तो वहीं रहेंगी पर हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के अस्तित्व, स्वत्व और स्वाभिमान को खतरा बढ़ता जाएगा। वीर सावरकर का विरोध आजादी के बाद भी हुआ। जीते जी उनसे अन्याय किया गया और मृत्यु के बाद अपमान।

विडम्‍बना देखिए भरी जवानी में काला पानी भोगते हुए वीर सावरकर ने अखंड हिन्दू राष्ट्र की आजादी के लिए कोल्हू चलाया, उसी काले पानी के कीर्ति स्तम्‍भ से कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर ने वीर सावरकर के यशोगान का पत्थर हटवाकर उन महात्मा गांधी का पत्थर लगा दिया जिन्होंने वहां कभी दस मिनट चरखा भी नहीं चलाया।

यह एक स्वतंत्रता सेनानी का घोर अपमान है। केंद्र सरकार को चाहिए तो यह था कि नोटों पर वीर सावरकर का काले पानी में कोल्हू चलाते हुए का चित्र छापती, वीर सावरकर के नाम पर वहां मैडिकल कालेज, मुम्‍बई में विश्वविद्यालय बनवाती, वीर सावरकर एक्‍सप्रैस गाड़ी चलाती तथा पाठ्यक्रमों में वीर सावरकर का साहित्य पढ़ाती। आज देश चाहता है कि हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के भविष्य की रक्षा के लिए वीर सावरकर के विचारों को पुन: जीवित करके आगे बढ़ें तथा तुष्टीकरण के अंधेरे को दूर करके स्वाभिमान का वीर सावरकर रूपी सूर्य उदय हो।

मेरा निश्चित मत है कि वीर जी के मार्ग पर चल कर ही हम भारत के भविष्य को बचा सकते हैं। 1947 की गलतियों का प्रायश्चित करने का समय आ गया है। सावरकर जी की भी यह प्रबल इच्छा थी। (क्रमश:)

Thursday, November 17, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (14)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (14)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 14-11-2011

भारत में हिन्दू धर्म का बार-बार अपमान किया गया। हिन्दुओं के धर्मस्थलों का सरकारीकरण किया गया। कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार ने हिन्दुओं के आस्था स्थलों पर आघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिन्दुओं के आराध्य देव श्रीराम द्वारा बनाए गए समुद्री सेतु श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही नकार दिया। जब इसके विरोध में जनमानस उमड़ा तो सरकार थर-थर कांपने लगी। जब अलगाववादियों और आतंकवादियों के दबाव में आकर जम्‍मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने बाबा अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए दी गई भूमि वापस ले ली तो हिन्दू समाज ने एकजुट होकर विरोध किया। इस आंदोलन में 11 हिन्दू शहीद हुए और एक हजार से अधिक लोग घायल हुए। स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान देने वाले वीर सावरकर को आजादी के बाद भी कांग्रेस ने निशाना बनाया और मौत के बाद भी उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

वीर सावरकर ने कहा था कि राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण करो-यह अखंड भारत की सुरक्षा का महामंत्र क्रांतिकारियों के पथ प्रदर्शक महान देशभक्त वीर सावरकर ने भारत संतानों को देते हुए 1955 में जोधपुर में हिन्दू महासभा के मंच से बोलते हुए कहा था- ''जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जाएगा तब तक भारत की स्वाधीनता,उसकी सीमाएं, उसकी सभ्‍यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है कि वे अधिक संख्‍या में सेना में भर्ती होकर सैन्य विद्या प्राप्त करें ताकि समय पडऩे पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योगदान दे सकें। विद्यालयों में सैनिक शिक्षा अनिवार्य रूप में दी जाए।''

मुझे लगता है कि आने वाले 20 वर्षों के भीतर हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान पर घोर संकट आने वाला है। भारत विभाजन जिन कारणों से हुआ था उसमें यूरोप के ईसाई देशों ब्रिटेन-अमरीका आदि का कुटिल खेल चल रहा था। कांग्रेस सत्ता प्राप्ति के लिए इतनी लालायित थी कि हिन्दू हितों के विरुद्ध जाकर भी मुस्लिम लीग और जिन्ना के साथ मिलकर देश और सत्ता का बंटवारा स्वीकार कर लिया। मुसलमानों को पाकिस्तान नाम का मुस्लिम देश मिल गया और जो बचा वह हिन्दुस्तान यानी हिन्दुओं का स्थान कहलाया। देश विभाजित होते ही मुसलमानों को भारत की देवभूमि पर एक इस्लामी राष्ट्र मिल गया पर हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर देश का बंटवारा होने के बाद भी हिन्दुओं को उनका हिन्दू राष्ट्र एक दिन भी नहीं मिला। महात्मा गांधी ने जिन्ना मेरा भाई का राग अलापते हुए बड़े जोर-शोर से हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा लगाया और प्रार्थना सभाओं में ईश्वर अल्ला तेरो नाम खूब गाया, लेकिन गांधी जी के सामने ही भाईचारे का वह नारा फेल हो गया। जिन्ना और सुहरावर्दी के डायरेक्‍ट एक्‍शन से लहुलुहान भारत का बंटवारा हो गया। खून से लथपथ अंग-भंग भारत माता के शरीर पर कांग्रेसी दिल्ली में ढोल बजाकर सत्ता प्राप्ति का जश्न मना रहे थे और बंटवारे के दिन को आजादी का दिन बता रहे हैं।

कांग्रेसी नेताओं गांधी-नेहरू के तुष्टीकरण के आदर्शों पर वर्तमान कांग्रेस चल रही है और कांग्रेसी प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। यह स्पष्टत: हिन्दू हितों की बलि देने की घोषणा ही है। इस वाक्‍य से हिन्दू युवकों का भविष्य दाव पर लग गया है। सच्चर समिति को लागू करके मुस्लिम तुष्टीकरण का नंगा नाच कांग्रेस ने शुरू कर दिया है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों के प्रति जो कार्यवाही इस देश की हिन्दू जनता चाहती है उतनी नहीं हो रही अपितु देश पर हमला करने वाले आतंकवादियों की सुरक्षा पर उन्हीं सुरक्षा बलों को लगाया हुआ है जिन्हें वे मारने आते हैं। आतंकवादियों की सुरक्षा और खाने-पीने पर भी देश की गरीब जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। करोड़ों नहीं एक अरब से अधिक रुपए भारत में पकड़े गए आतंकियों पर खर्च किए जा चुके हैं। जो सेना कश्मीर में भारत की सुरक्षा में लगी हुई है उसे सीमा से वापस बुला रहे हैं।

पाकिस्तान और बंगलादेश से हथियार और विचार लेकर भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त आतंकवादियों से नरमी बरती जा रही है। स्थितियां बंटवारे से पहले की तरह भयावह हो रही हैं। पर कोई बोलता नहीं और जो बोलता है उसे साम्‍प्रदायिक और भाईचारा बिगाडऩे वाला बताकर उसके पीछे हाथ धोकर मानवाधिकारियों की फौज साथ लेकर पीछे पड़ जाते हैं। (क्रमश:)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (13)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(13)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 13-11-2011

राजनीति की क्‍या परिभाषा होनी चाहिए, आज की परिस्थितियों को देखकर समझना मुश्किल नहीं। राजनीति मानवता से अलग ऐसे लोगों की भीड़ की बकवास है, जिन्हें अपने गिरेबां में झांकने में कोई दिलचस्पी नहीं परन्तु दूसरों के सद्गुण भी उन्हें 'जहर' लगते हैं, अत: यह शाश्वत दुष्टता का ही पर्याय है जबकि धर्म का मतलब है- धारण करने योग्य। क्षमा, करुणा, दया, परहित, ये सब धारण करने योग्य हैं। अत: जो इन्हें धारण करता है वह धार्मिक है। ऐसे में राजनीति क्‍या धर्म के साथ रह सकती है?

· राजनीति सड़े हुए लोगों की दुर्गंध है?

· धर्म स्थित प्रज्ञ महापुरुषों की सुगंध है।

अत: राजनीति और धर्म का क्‍या मेल? लेकिन एक तीसरी श्रेणी भी है, बाहरी वेशभूषा में एकधार्मिक व्यक्ति लग रहा है, परन्तु भीतर ही भीतर जिसके हृदय में राजनीति ही अठखेलियां करती है, मैं ऐसे लोगों को धार्मिक श्रेणी में नहीं रखता। वे निकृष्टतम हैं, ये रंगे सियार हैं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ नीति मर्मज्ञ कौटिल्य ने जब राष्ट्र की कल्पना की तो उसमें राजनीति शब्‍द कहीं नहीं था। आप सारा अर्थशास्त्र देख लें। आप को राजधर्म शब्‍द मिल जाएगा, आपको दंड नीति मिल जाएगी, राजनीति नहीं मिलेगी।

भगवान श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरुष ने भी यह कभी नहीं कहा- मैं हर युग में 'राजनीति' की स्थापना करने आता हूं। वह कहते हैं- मैं धर्म की स्थापना और दुष्टों का नाश करने के लिए आता हूं। जिस दिन राष्ट्र ने भगवान कृष्ण के वचनों का मर्म समझ लिया, धर्म की स्थापना हो जाएगी और स्वत: ही हो जाएगा दुष्टों का नाश भी।

भगवान के वचन हैं, 'विनाशाय च दुष्कृताम' इसलिए आज का नेता धर्म से घबराया हुआ है। खास तो हैं ये कांग्रेस के नेता और उनके दुमछल्ले। उन्हें पता है जिस दिन राष्ट्र 'धर्म प्राण' हुआ, राजनेता समाप्त हो जाएगा और उसे ऐसी जगह दफना दिया जाएगा, जहां से वह कभी निकल कर नहीं आ सके। इसी डर से उसने एक शब्‍द गढ़ लिया- धर्मनिरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ आप स्वयं जान लें- जो सारे मानवीय गुणों से विमुख हो, उसी को धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। उसके पास मानवीय गुणों को धारण करने की शक्ति नहीं लेकिन उसने अपना एक नया धर्म बना लिया है जो धर्मनिरपेक्ष है, उसकी नजर में धर्म क्‍या है, उसे देखें तो आप चमत्कृत हो जाएंगे।

पुराणों के अनुसार ऐसे लोग साधारण नहीं होते। या तो ये ब्रह्मज्ञानी होते हैं या परले दर्जे के मक्कार। आम जनता के लिए राजनेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, अपशब्‍द बोलते हैं, निंदा करते हैं और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। कारण एक ही है- उस हमाम की सदस्यता प्राप्त करना जहां प्रवेश करने पर राष्ट्रद्रोह भी क्षम्‍य है। आप अपराधी हों, तस्कर हों, घोटालेबाज हों, बदमाश हों, उससे कुछ फर्कनहीं पड़ता। पिछले 64 वर्षों से यही तमाशा जारी है। सारे देश के संवेदनशील लोग घबरा गए हैं। जरा इन आवाजों को सुनिये-

तस्कर, बिल्डर माफिया, लूट, अपहरण, क्‍लेश

हाय! दलालों में बिका गांधी तेरा देश।

सर्कस में लंगूर ने गजब दिखलाया खेल

रेल घोटालों की चला, ब्रेक कर दिया फेल।

मंत्री पद की शपथ ले, वो बोल मुस्काय

साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम्‍ब समाय।

आप जिसे चाहें वोट दें, जिसका चाहे साथ दें, चरित्र यही है। ऐसे में श्रीराम का नाम भी दिल में ही लें तो अच्छा है। न जाने कौन साम्‍प्रदायिकता का आरोप लगाकर आपको दूर भगा दे। (क्रमश:)

Wednesday, November 16, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग-(12)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(12)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 12-11-2011

आज मैं चर्चा करूंगा शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक की। शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक को लेकर जिस तरह से साम्‍प्रदायिक राजनीति की गई वह काफी अशोभनीय रही। हाल ही में संसद की गृह मंत्रालय की स्थायी समिति ने शत्रु सम्‍पत्ति विधेयक को एक मत से नामंजूर कर दिया। इसकी पुरजोर वकालत कर रहे गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम और विधि मंत्री सलमान खुर्शीद के लिए यह करारा झटका है। संसदीय समिति ने राजा महमूदाबाद एम.के. मुहम्‍मद खान का पक्ष भी सुना, जो सुप्रीम कोर्ट में शत्रु सम्‍पत्ति मामले में याचिकाकर्ता थे।

दरअसल गृह मंत्रालय विधेयक में किए गए बदलावों पर समिति को स्पष्टीकरण देने में विफल रहा। विधेयक पर संसदीय समिति का फैसला वैसे तो देश भर की शत्रु सम्‍पत्तियों से जुड़ा है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश पर होगा। वहां राजा महमूदाबाद विभाजन के समय अपने पिता के पाकिस्तान चले जाने के बाद शत्रु सम्‍पत्ति के तहत गई भारी-भरकम जायदाद हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के उम्‍मीदवार थे। पूर्व में अदालत में उनके इस मामले को चिदम्‍बरम एवं खुर्शीद कानूनी सलाह भी दे चुके हैं। भाजपा सांसद वेंकैया नायडू की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट गुरुवार को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को सौंप दी है। रिपोर्ट सभी दलों की आम राय से मंजूर की गई है, जिसमें कांग्रेस के दस सांसद भी शामिल हैं। समिति ने सिफारिश की है कि सरकार उसके सुझावों के मुताबिक मौजूदा विधेयक की जगह नया विधेयक लेकर आए। समिति ने कहा है कि हजारों करोड़ रुपए की शत्रु सम्‍पत्ति उन लोगों के हाथ में नहीं जानी चाहिए,जिनका उस पर वैधानिक हक नहीं है। भारत नीति प्रतिष्ठान के अनुसार लोकनीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हित होता है। यह संकीर्णताओं से ऊपर होता है। न्यायालय या जनमत इसे जरूर प्रभावित करता है परन्तु कार्यपालिका एवं विधायिका से ऐतिहासिक, सामाजिक एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में ऐसी अनेक प्रवृत्तियों की उत्पत्ति हुई है जिनसे लोकनीतियों एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन हो रहा है। इसी का उदाहरण वर्तमान विवाद है। भारत सरकार के ही दो मंत्री गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम एवं विधि, अल्पसंख्‍यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद, इस विषय पर एक-दूसरे का प्रतिवाद करते रहे। गृह मंत्रालय की दृढ़ता को तोडऩे के लिए जिस राजनीतिक ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया वह दशकों से भारत की राजनीति एवं नीति निर्धारकों को कमजोर करती रही है। यह है अल्पसंख्‍यक हित के नाम पर लोकनीतियों को पुनर्परिभाषित करने के लिए दबाव। यही हुआ शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम के संबंध में। कुलीनों ने अपनी राजनीति को जमीन पर उतार कर इसे 'मुस्लिम मुद्दा' बना दिया। कार्यपालिका के विवेक एवं तर्क का स्थान क्रमश: संकीर्णता एवं भावना ने ले लिया। मुस्लिम सांसदों ने एकजुट होकर शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम से जुड़े पक्षों को मुस्लिम विरोधी बताया और राजनीति में वही परम्‍परागत साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण इस विषय पर भी हो गया।

विभाजन के बाद लाखों लोगों ने भारत-पाक की सीमा लांघी थी। स्वाभाविक है कि लोगों की राष्ट्रीयता भी बदली। ऐसे शरणार्थियों की सम्‍पत्तियों को भारत एवं पाकिस्तान की सरकारों ने अधिग्रहण कर Custodian के अन्तर्गत कर दिया। उन लोगों को भी पाकिस्तान छोडऩे के लिए बाध्य किया जो ऐसा ही चाहते थे। इसी क्रम में भारत में Evacuee Property Act आया था। पाकिस्तान एवं बाद में बंगलादेश ने शत्रु सम्‍पत्तियों को अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था के ढांचे में उपयोग कर लिया। भारत में व्यवस्था की कमजोर इच्छा-शक्ति ने इसे गैर कानूनी कब्‍जे एवं किरायेदारों के हवाले कर दिया। साठ के दशक तक इन सम्‍पत्तियों को शत्रु सम्‍पत्ति नहीं माना गया। जो लोग इसे मुस्लिम प्रश्न मानते हैं उन्हें शत्रु सम्‍पत्ति का या तो ज्ञान नहीं है या वे जानबूझकर तथ्यों को अनदेखा कर रहे हैं।

शत्रु सम्‍पत्ति की अवधारणा भारत में 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद आई जब शत्रु राष्ट्र से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जुड़े सक्रिय लोगों की सम्‍पत्ति सरकार ने अधिग्रहित कर ली। फिर पाकिस्तान के साथ 1965 में युद्ध हुआ। स्वाभाविक था जो भारत-चीन युद्ध के समय हुआ था वही नीति दुहराई गई। तभी 1968 में शत्रु सम्‍पत्ति अधिनियम आया। राजा महमूदाबाद 1958 में स्वेच्छा से पाकिस्तान गए थे। उनकी सम्‍पत्ति को शत्रु सम्‍पत्ति के तहत अधिग्रहित कर लिया गया। इसे अल्पसंख्‍यक तथा बहुसंख्‍यक प्रश्र मानना देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया को भ्रमित एवं कमजोर करना है, परन्तु सरकार ने इसी कमजोरी का परिचय देते हुए अपने ही द्वारा लाए गए पहले विधेयक को निरस्त कर नया विधेयक तैयार किया। द्वितीय शत्रु सम्‍पत्ति (संशोधन और विधिमान्यकरण) विधेयक 2010, जो साम्‍प्रदायिक राजनीति के दबाव में तैयार किया गया विधेयक है। नीति का गलत या सही होना उतना दुष्परिणामकारी नहीं होता है जितना कि संकीर्णतावादी ताकतों के दबाव में उसका निर्माण करना होता है। राष्ट्रीयता से जुड़ा यह कानून अपरिवर्तनीय होना चाहिए था। न्यायालय ने इसे घसीटकर साम्‍प्रदायिकता के दायरे में ला खड़ा कर दिया है। (क्रमश:)

Monday, November 14, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग-(11)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(11)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 11-11-2011

धर्मनिरपेक्ष शब्‍द की धारणा के कारण हमारे देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र (Secular Nation) कहा जाने लगा। राष्ट्र का धर्म से कुछ लेना-देना नहीं इसलिए यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यदि संविधान में शुरू से सैकुलर का अनुवाद धर्मनिरपेक्ष न करके सम्‍प्रदाय निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष कर दिया जाता तो भ्रांत धारणाएं पैदा नहीं होतीं। धर्मनिरपेक्षता को अस्त्र बनाकर हिन्दुत्व पर आघात किया जाता रहा। कांग्रेस,कम्‍युनिस्ट और अन्य दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमान, ईसाइयों को विशेषाधिकार दिए जाने की मांग शुरू कर दी। वोटों के लालच में इस शब्‍द का खुला दुरुपयोग किया जाने लगा। जब कभी हिन्दू हितों की बात हो तो उन्हें धर्मनिरपेक्षता विरोधी बताकर विरोध किया जाने लगा। इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष शब्‍द को हिन्दू विरोध का पर्यायवाची मान लिया गया। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने हिन्दू मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग रोकने के लिए एक आयोग बनाया था। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इस पर आपत्ति करते हुए संसद में कहा था कि क्‍या केवल मठों और मंदिरों की सम्‍पत्ति का ही दुरुपयोग होता है? क्‍या मस्जिदों और गिरजाघरों की सम्‍पत्ति का दुरुपयोग नहीं होता? क्‍या सैकुलर स्टेट में सबके लिए एक सा कानून नहीं होना चाहिए?

हमारे देश में रिश्वत देना और लेना दोनों ही कानूनी अपराध हैं और इसके लिए दंड का प्रावधान भी है। आजकल 'सुविधा शुल्क' के नाम से जाने जाने वाली रिश्वत को हमारी सरकार संविधान के अनुच्छेदों में संशोधन करके जनता तक पहुंचाती है तथा इस प्रकार यह वैध और प्रासंगिक बन जाता है। आजादी के समय से ही आरक्षण का हमारे देश के विकास के लिए कुछ खास जातियों और जनजातियों के लिए प्रावधान किया गया था लेकिन वोट बैंक पर अपना कब्‍जा बनाए रखने के लिए और अपनी झूठी भावना के साथ जनभावना जोडऩे के लिए इसकी अवधि आज तक बढ़ाई जा रही है। सरकारें बदलीं,लेकिन न ही वोट बैंक की राजनीति खत्म हुई और न ही आरक्षण की अवधि बढ़ाने का सिलसिला थमा। अलबत्ता आरक्षण का दायरा बढ़ा दिया गया और इसमें कोटा भी शामिल हो गया। वोटों की राजनीति ने मंडल कमीशन को जन्म दिया और गुर्जरों ने आंदोलन कर खुद के लिए कोटा हासिल किया या यूं कहें कि सरकार से कोटा छीना। यूपीए सरकार ने तो प्राइवेट सैक्‍टर में भी आरक्षण की बात कह डाली लेकिन चूंकि प्राइवेट सैक्‍टर पर सरकार का कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं है इसलिए सरकार को इसमें असफलता ही हाथ लगी। सरकार ने प्राइवेट सैक्‍टर के लिए दूसरी चाल चली और घोषणा की कि सरकार सरकारी खरीद का 4 प्रतिशत उन कम्‍पनियों से करेगी जिनका स्वामित्व दलित और अनुसूचित जातियों के पास है।

हालांकि यह बात अलग है कि आरक्षण और कोटा जैसी सुविधाओं का लाभ असली जरूरतमंदों तक पहुंच नहीं पाता, बल्कि क्रीमीलेयर इसका फायदा ज्यादा उठाते हैं। आज हालात यह हैं कि पढ़ाई,नौकरी, व्यापार हर क्षेत्र में आरक्षण को जगह मिली है। यहां तक कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी आरक्षण लागू है। यह बात समझ से परे है कि मानव जीवन से जुड़े पेशे में आरक्षण देना वोट बैंक की राजनीति के अलावा क्‍या हो सकता है? इसे तो सीधे तौर पर 'राजनीतिक घूस' कहा जा सकता है।

अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तो कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। राहुल गांधी के भरसक प्रयासों से भी कांग्रेस के वहां पुनर्जीवित होने के आसार दिखाई नहीं देते। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा की नजरें मुस्लिम वोट बैंक पर हैं और कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के लिए ऐसा ब्रह्मास्त्र छोडऩा चाहती है, जिससे उसे चुनावी जीत हासिल हो। मुख्‍यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मुस्लिम समाज के लिए आरक्षण की मांग की थी। बस फिर क्‍या था केन्द्रीय विधि मंत्री पहुंच गए लखनऊ और कर दिया ऐलान कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इस मामले में काफी गम्‍भीर हैं और सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों को आरक्षण की घोषणा जल्द कर दी जाएगी। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि सरकार सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल करने के लिए तैयार है। चुनावों से पहले मुस्लिमों को आरक्षण एक सीधी रिश्वत है। सवर्ण हिन्दू गरीबी में भले ही एडिय़ां रगड़-रगड़ कर मर जाए कोई नहीं पूछता। न सरकार, न रिश्तेदार, न मित्र, कोई सहायता नहीं करता लेकिन मुस्लिमों को इस बात से सतर्क रहना होगा कि चुनाव से पहले सहानुभूति जताकर राजनीतिक दल उनसे धोखा तो नहीं कर रहे। (क्रमश:)

हिन्‍दुओं की कत्लगाह बनता पाकिस्तान

अभिषेक रंजन

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय खासकर हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गए हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक इसाई, हिंदू और सिख कौम पर पाकिस्तान में हमले कोई नई बात नहीं है। यही वजह है कि डरे-सहमे अल्पसंख्यक लोग भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपने जानमाल की हिफाजत करने के लिए पाकिस्तान से पलायन कर रहे हैं। इसकी चिंता न तो इस्लामाबाद को है और न ही नई दिल्ली में बैठी हमारी सरकार को।

ताजा घटना सिंध की राजधानी कराची से 400 मील दूर चक कस्बे की है। यहां ईद-उल-जुहा के दिन बंदूकधारियों ने तीन हिंदू डॉक्टरों की हत्या कर दी, जिसके बाद अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय में दहशत का माहौल व्याप्त है। दरअसल, फीस के मुद्दे पर झगड़ा होने के बाद इस कबीले के कुछ लोग बदला लेने की फिराक में थे। दिवाली से ठीक पहले तीन हिंदू युवकों को एक मुस्लिम नर्तकी के साथ पकड़ लिया गया। कबीले के लोगों ने कहा कि लड़की के साथ बलात्कार हुआ है। लिहाजा, इसके बदले में एक हिंदू लड़की दी जाए, जिसके साथ चार मुस्लिम बलात्कार करेंगे। हिंदुओं को यह बात बेहद नागवार गुजरी, क्योंकि न तो उस नर्तकी के साथ बलात्कार किया गया था और न ही उसे नाचने के लिए मजबूर किया गया था। घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाई है। इससे यह बात साबित होती है कि किस तरह पाकिस्तान की पुलिस ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों का साथ देती है।

गौरतलब है कि चक कस्बे में हिंदुओं की कुल आबादी पचास हजार के करीब है। इस घटना के बाद यहां के लोग इस कदर खौफजदा हैं कि उन्होंने घरों से निकलना बंद कर दिया। एक लिहाज से वहां कई दिनों तक अघोषित कफ्र्यू जैसा माहौल था। हिंदू डॉक्टरों की हत्या के बाद पाकिस्तान हिंदू परिषद ने राष्ट्रपति जरदारी, चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी और सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी से अपील की है कि सिंध के अलग-अलग हिस्सों में हिंदुओं पर हो रहे हमलों को रोका जाए।

बता दें कि पाकिस्तान की 17.5 करोड़ की आबादी में हिंदुओं की संख्या दो प्रतिशत से भी कम है। पाकिस्तान की आज जैसी हालत हो गई है, उस स्थिति में वहां रहने वाले हिंदू, इसाई और सिख समुदाय के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इसी साल जनवरी में ईश निंदा के आरोप में लाहौर जेल में बंद ईसाई महिला आसिया बीवी की हिमायत करने की खातिर पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक मुमताज कादरी ने इस्लामाबाद में कर दी थी। उसके दो महीने बाद ही पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की भी हत्या कर दी गई। मारे गए ये दोनों नेताओं की गिनती एक उदार शख्स के रूप में होती थी। तसीर और भट्टी दोनों सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सीनियर लीडर थे, लेकिन अफसोस की बात यह है कि जरदारी और गिलानी की हुकूमत उनकी शहादत से कोई सीख नहीं लेना चाहती। इससे ज्यादा तकलीफ की बात और क्या हो सकती है कि जिस विवादास्पद ईश निंदा कानून में संशोधन करने की मंशा इन्होंने जाहिर थी, उस प्रस्ताव को गिलानी सरकार ने वापस ले लिया। उनके इस कदम से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को काफी धक्का लगा है। जिस सोच के साथ पाकिस्तान की बुनियाद पड़ी थी, वह ख्याल आज कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। यह अफसोसनाक है कि मुहम्मद अली जिन्ना ने जो तसव्वुर किया था, वह सही मायनों में पाकिस्तान का मुकद्दर नहीं बन सका।

आज दुनिया तरक्की का ख्वाब देख रही है, लेकिन पाकिस्तान अपनी रुढि़वादी सोच पर ही कायम है। बच्चों में धार्मिक कट्टरवाद का बीज बोने के साथ ही वहां खुलेआम हिंदुओं के प्रति नफरत का पाठ पढ़ाया जा रहा है। स्कूलों की पाठ्य पुस्तकें ईसाइयों और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगल रही हैं। इन किताबों में अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में सामने लाया जा रहा है। एक अमेरिकी रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाठ्य पुस्तकों के इस्लामीकरण का काम सैन्य शासक जिया उल हक के जमाने में ही शुरू हो गया था। इसके बाद वर्ष 2006 में सरकार ने किताबों से विवादास्पद अंश हटाने की घोषणा की, लेकिन यह कागजों तक ही सीमित रह गई।

वर्ष 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद कहा गया कि था कि यहां अल्पसंख्यकों को पूरे अधिकार दिए जाएंगे, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश जरूर होगा, लेकिन आज के हालात पर गौर करें तो पाकिस्तान में गैर मुसलमानों की परिस्थितियां खासी चिंताजनक हैं। उनकी अपनी पहचान एक तरह से खो गई है। बंटवारे से पहले पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगभग 20 फीसदी थी, जो छह दशकों के बाद महज दो फीसदी रह गई है। जितने हिंदू बचे हैं, वे किस तरह जी रहे हैं, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य होगा कि पाकिस्तान में रहने वाले लाखों हिंदुओं के किसी भी त्योहार पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई छुट्टी घोषित नहीं है। चाहे दिवाली-दशहरा हो या रामनवमी, हिंदुओं को इस खास दिन भी छुट्टी नहीं दी जाती। अल्पसंख्यकों के हितों की बात करने वाली पाकिस्तान सरकार के पास इस बात का कोई जबाव है?

जहां तक भारत की बात है कि उसने तो पाकिस्तान के हिंदुओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने मालदीव गए। वहां उनकी मुलाकात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी से हुई। दोनों नेताओं ने गर्मजोशी के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बात की, लेकिन पाकिस्तान में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री ने अपने समकक्ष से कोई चर्चा नहीं की।

दरअसल, अभी इस्लामाबाद और नई दिल्ली की सरकार अपने आपसी रिश्ते और कारोबारी रिश्तों की मजबूती पर जोर दे रही हैं। लेकिन दोनों सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरहदों के दोनों ओर अगर आम आदमी सुरक्षित नहीं हैं तो अमन बहाली की सारी कोशिशें बेकार हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

स्रोत:- दैनिक जागरण 14 नवम्‍बर 2011

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