Tuesday, November 22, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (18)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (18)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 18-11-2011

कांग्रेस का साम्‍प्रदायिक चेहरा बार-बार सामने आया है। पहले कांग्रेस के इक्का-दुक्का नेता ही अपने बयानों से चर्चित होते थे, अब हर कोई प्रचार पाने के लिए किसी भी हद तक पहुंच जाता है। कांग्रेस ने अपने कुछ राजनीतिज्ञों को इस काम पर लगाया है कि वे जमकर साम्‍प्रदायिक राजनीति करें और कोई मौका न चूकें।

  • बटला हाऊस मुठभेड़ में शहीद हुए इंस्पैक्‍टर महेश शर्मा की शहादत का अपमान किया गया।
  • 26/11 के मुम्‍बई हमले में शहीद हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे और साथियों की शहादत पर सवालिया निशान लगाया गया। आखिर क्‍यों?

बटला हाऊस मुठभेड़ जांबाज पुलिस बलों की सफलता थी। मारे गए आतंकी मुसलमान थे। कांग्रेस के भोंपू दिग्विजय सिंह के लिए मौका था। दिग्गी ने आजमगढ़ दौरे के दौरान बटला हाऊस मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग कर डाली। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की तरफ से शहीद महेश चन्द्र शर्मा के परिवार से सहानुभूति व्यक्त करने की बजाय आरोपी आतंकियों के परिवार से सहानुभूति व्यक्त की गई।

26/11 के मुम्‍बई हमले में शहीद हेमंत करकरे को लेकर पहले अब्‍दुल रहमान अंतुले और बाद में दिग्गी राजा ने सवाल उठाए। दिग्गी राजा ने सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया कि हेमंत करकरे ने हमले से दो घंटे पहले उनसे फोन पर बातचीत की और करकरे ने हिन्दू संगठनों से अपनी जान को खतरा बताया था। उनकी इस बातचीत का कोई फोन रिकार्ड नहीं मिला। दुनिया जानती है कि 26/11 हमले के जिम्‍मेदार पाक के आतंकी संगठन हैं तो फिर इस हमले का रुख हिन्दू संगठनों की ओर मोड़ कर दिग्गी ने भारत सरकार के स्टैंड को ही कमजोर किया। कांग्रेस ने शहीदों की शहादत को झुठलाने का काम किया। शहीद करकरे की पत्नी भी कांग्रेस के रवैये से आहत हुईं और उन्होंने कांग्रेस की निंदा की लेकिन कांग्रेस खामोश रही। उसे तो मुस्लिम वोट बैंक की चिंता है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु और 26/11 मुमबई हमले के दोषी कसाब को फांसी की सजा पर भी कांग्रेस ने जमकर साम्‍प्रदायिकराजनीति की।

अफजल का अर्थ होता है विद्वान और श्रेष्ठ लेकिन आजकल एक और ही अफजल को लेकर देश में बहस छिड़ी है। आज की तारीख में अफजल गुरु वह शख्‍स है, जिसको भारतीय संसद पर वर्ष 2001 के हमले के मामले में न्यायालय ने फांसी की सजा दी है। न्यायालय के आदेशानुसार अफजल को 20 अक्तूबर, 2006 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी जानी थी, लेकिन सियासतदानों की कारस्तानी और सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण 11 अक्तूबर, 2006 को निर्णय लिया गया कि अगले आदेश तकअफजल को फांसी नहीं दी जाएगी। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने इस आशय का पत्र तिहाड़ जेल प्रशासन को लिखा, जिसकी पुष्टि जेल प्रशासन ने भी की। अफजल प्रकरण में जिस प्रकार से केन्द्र में काबिज सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने बयान जारी किए हैं, वह किसी भी सूरत में राष्ट्रहित में नहीं कहे जा सकते हैं। काबिले गौर है कि जब भी कहीं भारत राष्ट्र का जिक्र किया जाता है तो वहां प्रतीक के रूप में संसद या अशोक स्तम्‍भ प्रयुक्त किया जाता है। अफजल ने किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि संसद पर हमले की पृष्ठभूमि का ताना-बाना बुनकर पूरे राष्ट्र पर हमला किया। उसने भारत की अखंडता और सम्‍प्रभुत्ता को तार-तार करने का गुनाह किया है, जिसकी सजा मौत और सिर्फ मौत है,लेकिन हमारे सियासतदानों, विशेषकर कांग्रेसियों ने जिस तरह से वोट की राजनीति से अभिभूत होकर मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल खेला है, वह किसी भी सूरत में सच्चे भारतीय के लिए सहनीय नहीं है। सबसे पहले जम्‍मू-कश्मीर के मुख्‍यमंत्री गुलाम नबी आजाद और फिर वहीं के पूर्व मुख्‍यमंत्री फारूकअब्‍दुल्ला का कहना कि यदि अफजल को फांसी दी जाती है तो प्रदेश की कानून-व्यवस्था बिगडऩे की आशंका है, हास्यास्पद लगता है। आखिर एक व्यक्ति जिसने पूरे राष्ट्र के प्रजातंत्र के मंदिर पर हमला किया है, उसको सजा नहीं दिए जाने की पैरवी एक जिम्‍मेदार व्यक्ति द्वारा करना ठेस पहुंचाता है। इतना ही नहीं, गुलाम नबी आजाद के बयान का जिस प्रकार से कांग्रेस ने समर्थन किया, वह समझ से परे था। कई राज्यों में होने वाले विधानसभा और निकाय चुनावों के कारण कांग्रेस ने अफजल मामले को उलझाकर रख दिया था। 26/11 के मुम्‍बई हमले में पकड़े गए एकमात्र जीवित आतंकवादी कसाब के मामले में भी यही रुख अपनाया गया जिसकी चर्चा मैं कल करूंगा। (क्रमश:)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (17)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (17)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 17-11-2011

इस राष्ट्र में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े कांग्रेसियों ने राष्ट्रवादियों को आतंकवादी करार देने की पूरी कोशिश की। यह सौ प्रतिशत सत्य है कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यदि कोई भगवा, हरा, काला, नीला या अन्य किसी रंग को आतंक का प्रतीक बताता है तो वह गलत है। ये सब प्रकृति के उपहार हैं। भगवा शब्‍द भगवान या ईश्वर का प्रतीक है लेकिन इस देश में भगवा रंग पर काली सियासत की गई। अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्‍बरम, दिग्विजय सिंह या कुछ अन्य नेताओं ने भगवा आतंकवाद के जुमले का सहारा लिया। ये लोग भगवा आतंकवाद पर प्रहार करके मुस्लिम समुदाय के बीच नायक बनना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति अनर्थकारी है। गृहमंत्री और उनके समर्थकों को इतिहास में झांक कर देखना चाहिए कि भगवा संस्कृति और उनके अनुयायी कितने उदार और अहिंसक रहे हैं।

जरा याद कीजिए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी की तुलना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से करके अपनी राजनीतिक अपरिपक्‍वता का प्रमाण दिया था। संघ निश्चित रूप से हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रवर्तक है और हिन्दू संस्कृति को भारतीय संस्कृति के पर्याय के रूप में देखता है मगर इसकी राष्ट्रभक्ति पर संदेह करना रात को दिन बताने की तरह है। जरा सोचिये आजादी से पहले जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने वर्धा आश्रम के सामने ही लगे संघ के शिविर में गए थे तो अपने स्वयंसेवकों की अनुशासनप्रियता और जाति-पाति के बंधन से दूर देख कर कहना पड़ा था कि यदि कांग्रेस के पास ऐसे अनुशासित कार्यकर्ता हों तो आजादी का आंदोलन अंग्रेजों को देश छोडऩे के लिए बहुत जल्दी मजबूर कर देगा। इतना ही नहीं महान समाजवादी चिंतक और जन नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने भी संघ के बारे में कहा था कि यदि मेरे पास संघ जैसा संगठन हो तो मैं पूरे देश में पांच साल के भीतर ही समाजवादी समाज की स्थापना कर सकता हूं। संघ ऐसा संगठन है जिसकी प्रशंसा स्वयं पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी की थी।

1962 के भारत-चीन युद्ध के समय संघ के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार भारत की सेनाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए खुद पूरे देश में आगे बढक़र नागरिक क्षेत्रों में मोर्चा सम्‍भाला था उसे देखकर स्वयं पं. नेहरू को इस संगठन की राष्ट्रभक्ति की प्रशंसा करनी पड़ी थी और उसके बाद 26 जनवरी की परेड में संघ के गणवेशधारी स्वयंसेवकों को शामिल किया गया था। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने में पुलिस प्रशासन की पूरी मदद की थी और छोटे से लेकर बड़े शहरों तक में इसके गणवेशधारी कार्यकर्ता नागरिकों को पाकिस्तानी हमले के समय सुरक्षा का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी जुबान पर हमेशा भारत माता की जय का उद्घोष रहता है।

भारत में हिन्दू संस्कृति की बात करना क्‍या गुनाह है? संघ पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध जरूर लगाया गया था मगर बापू की हत्या में संघ के किसी कार्यकर्ता का हाथ नहीं पाया गया था। हिन्दू महासभा के नेता स्व. वीर विनायक दामोदर सावरकर को भी इस हत्याकांड में गिरफ्तार किया गया था मगर उनकी राष्ट्रभक्ति पर भी क्‍या कोई कांग्रेसी प्रश्र चिन्ह लगा सकता है? सावरकर के गुरु बंगाल के क्रांतिकारी श्याम जी कृष्ण वर्मा थे। संघ और हिन्दू महासभा की विचारधारा में भी मूलभूत अंतर शुरू से ही रहा है।

हिन्दू सभा राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं के सैनिकीकरण के पक्ष में थी जबकि संघ के संस्थापक डा. बलिराम केशव हेडगेवार का लक्ष्य हिन्दुओं का मजबूत सांस्कृतिक संगठन स्थापित करना था। इस सच को कैसे झुठलाया जा सकता है कि 1947 में भारत का बंटवारा होने के समय संघ के कार्यकर्ताओं ने पश्चिमी पाकिस्तान (पंजाब) के मोर्चे पर हिन्दुओं की रक्षा की थी।

मैं फिलहाल राजनीतिक सोच की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि संघ की व्यावहारिक कार्यप्रणाली की बात कर रहा हूं। संघ भारतीय संस्कृति का विश्वविद्यालय रहा है। यह जिस हिन्दू गौरव की बात करता है उसका मतलब मुस्लिम विरोधी नहीं है बल्कि मुस्लिम पहचान को भारत की जड़ों में खोजना है।(क्रमश:)

खौफ : हर महीने दस हिंदू परिवार छोड़ रहे पाकिस्तान

खौफ : हर महीने दस हिंदू परिवार छोड़ रहे पाकिस्तान


पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बीते कुछ हफ्तों के दौरान तीन हिंदुओं की हत्या और अपहरण की घटनाओं के कारण समुदाय की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। पाकिस्तान हिंदू परिषद और पाकिस्तान हिंदू सेवा आदि संगठनों का दावा है कि भेदभाव, फिरौती के लिए अपहरण, जबरदस्ती धन वसूली और दबाव डालकर धर्म परिवर्तन की घटनाओं के कारण कई हिंदू परिवार विदेश में पलायन कर गए हैं और यह प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ रही है। पाकिस्तान हिंदू परिषद के अध्यक्ष संजेश कुमार ने कहा, सरकार यह बात महसूस नहीं कर रही है कि किस तेजी से यह पलायन हो रहा है, क्योंकि हिंदू समुदाय के मन में असुरक्षा की भावना है। कुमार ने कहा कि अनुमान के अनुसार हर माह करीब आठ से दस हिंदू परिवार पाकिस्तान से पलायन कर जाते हैं। इनमें से अधिकतर मध्यम वर्ग या संपन्न तबके के हैं।

उन्होंने कहा कि गरीब या निचले तबके के हिंदुओं के पाकिस्तान में बने रहने के अलावा कोई और चारा नहीं है। कुमार ने कहा कि यह दुखद है कि सदियों जिन परिवारों की जड़ें सिंध में रही हैं उन्हें पलायन करना पड़ रहा है। यह दुखद सचाई है। गैर आधिकारिक रूप से पाकिस्तान में 70 लाख हिंदू रहते हैं जो दुनिया में हिंदुओं की पांचवीं सबसे बड़ी आबादी है। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हिंदुओं का पलायन पाकिस्तान के लिए नुकसान है, क्योंकि भारत सहित विदेश जाने वाले इन लोगों में से अधिकतर पेशेवर, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान हैं या अपने बड़े व्यवसाय चला रहे हैं। काउंसिल के संस्थापक रमेश कुमार ने कहा कि यह पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिभा पलायन है, क्योंकि हिंदुओं का मानना है कि उन्हें वह सुरक्षा और अधिकार नहीं मिल रहे जो अन्य पाकिस्तानियों को उपलब्ध हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक विज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पसंख्यकों विशेषकर हिन्दुओं के लिए स्थिति में नाटकीय परिवर्तन जनरल जिया उल हक के 11 साल के सैन्य शासन के दौरान आया। पूर्व खिलाड़ी मोहिंदर कुमार याद करते हैं, जिया के समय से पहले चीजें अलग थीं। काफी सहिष्णुता थी तथा हिन्दू लोग अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ बिना भय के शांति से रहते थे। उन्होंने कहा, जिया के समय से कट्टरपंथ और असहिष्णुता बढ़ गई तथा अपराधियों ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। हिंदुओं में आज जो भय है उसका कारण वास्तविक जीवन की घटनाएं हैं। घटनाओं के शिकार बने परिवार उस बारे में बात नहीं करना चाहते, क्योंकि उन्हें उसके नतीजों का भय है।

मशहूर बालीवुड अभिनेत्री जूही चावला के रिश्तेदार सतीश आनंद का कराची में 2009 में अपहरण हो गया था। छह माह तक बंधक बनाए रखने के बाद उन्हें रिहा कराने के लिए अपहरण करने वालों को फिरौती की रकम चुकाई गई। आनंद ने घटना की याद करते हुए बताया कि उन्हें पाकिस्तान के कबाइली क्षेत्र मीरांशाह से चार-पांच घंटे के सफर वाली दूरी पर स्थित बानू में उन्हें बंद करके रखा गया था। उन्होंने कहा, मैंने अपने जीवन में कभी इतना असहाय महसूस नहीं किया। इस घटना के बाद हमारे कुछ परिजन विदेश पलायन कर गए। मशहूर निर्माण एवं वितरण कंपनी का स्वामित्व करने वाले आनंद की रिहाई के लिए एक करोड़ रुपये दिए गए थे। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के राजेश कुमार का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में ही कराची से करीब 200 हिंदू परिवार पाकिस्तान से पलायन कर गए।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग, सिंघ के उपाध्यक्ष अमरनाथ मोटूमल ने कहा कि अल्पसंख्यक विशेषकर गरीब लोग चुपचाप सब सह रहे हैं। कुमार कहते हैं कि फिरौती के लिए अपहरण के अलावा हिंदुओं को जबरदस्ती धन वसूली तथा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जा रहा है विशेषकर अंदरूनी इलाकों में। उन्होंने कहा कि सिंध में इस तरह के धर्म परिवर्तन लगभग हर हफ्ते होते हैं। हाल में खैरपुर, दादू और जैकबाबाद से हिंदू लड़कियों के अपहरण के कारण हिंदू परिवारों को मजबूरी में उन गांवों को छोड़ना पड़ा जहां वे सदियों से रह रहे थे। स्थानीय लोगों के अनुसार अकेले घोटकी में ही करीब 800 परिवार बाहर चले गए। कुमार ने 2007 में सिंध उच्च न्यायालय में बलपूर्वक धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक याचिका दायर की थी।

उसके बाद से चार वर्ष गुजर गए और उन्हें अब तक यह उम्मीद है कि कुछ ठोस परिणाम आएंगे। कुमार कहते हैं, मुझे पाकिस्तान की न्यायिक प्रणाली में पूरा भरोसा है। देखिए क्या होता है। साल भर पहले ठेकेदार हिमेश कुमार के पुत्र नितिन का कराची में उसके स्कूल से बाहर अपहरण कर लिया गया। अपहरणकर्ताओं के साथ कई महीने तक चली बातचीत के बाद नितिन को अंतत: रिहा कर दिया गया। पुत्र की रिहाई के बाद कुमार अपने परिवार के साथ भारत चले गए। उन्होंने इस बारे में सिर्फ करीबी मित्रों को जानकारी दी और अपना व्यवसाय समेटकर वे चुपचाप चले गए।

जैकबाबाद निवासी दो बच्चों की मां द्रौपदी मंधन को अपने जीवन में धार्मिक भेदभाव का सामना पहली बार उस समय करना पड़ा जब वह चिकित्सा को अपना करियर बनाने के लिए कराची आई। उन्होंने कराची में एक मकान तय किया और उसके लिए एक एस्टेट एजेंट के जरिए सौदा किया, लेकिन वह जब उस घर में रहने गई तो मकान मालिक ने उन्हें भगा दिया। द्रौपदी याद करती हैं कि मकान मालिक ने उन्हें एवं उनके बच्चे को अपवित्र कहा और उनसे सौदे को भूल जाने को कहा।

स्रोत:- दैनिक जागरण 21 नवम्‍बर 2011

Monday, November 21, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (16)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (16)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक 16-11-2011

आजादी के बाद भी कांग्रेस और अन्य दलों ने सत्ता के लिए हमेशा हिन्दुवादी संगठनों को निशाना बनाया। इसे देश का दुर्भाग्य कहें या पंडित नेहरू का सौभाग्य कि उन्होंने भी उस समय तेजी से शक्तिशाली हो रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुचलने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की हत्या का घृणित आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। दिन-रात दुष्प्रचार कर जनता के मन में संघ के प्रति घृणा भर दी और इस तरह अपनी पार्टी और वंश का राजनीतिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। महात्मा गांधी की हत्या में संघ निर्दोष पाया गया और दो वर्ष बाद उससे प्रतिबंध हटा लिया गया। कई बार संघ पर प्रतिबंध लगाया और हटाया गया। कांग्रेस आज भी पुराना खेल खेल रही है और तुष्टीकरण की नीतियों के चलते हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। वर्तमान में यह भूमिका चिदम्‍बरम व दिग्गी राजा निभा रहे हैं। हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म को अपमानित किया जाता है जबकि हिन्दू धर्म किसी दूसरे धर्म का अपमान नहीं करता। इस पर मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है।

''सर्वपल्ली राधाकृष्णन जब एक छोटे ईसाई स्कूल में पढ़ते थे तभी से हिन्दू धर्म के प्रति ईसाई अध्यापकों के द्वेषपूर्ण उद्गारों को सुनते आए थे। स्कूल में लडक़ों को 'बाइबल' तो पढ़ाई ही जाती थी पर बात-बात में हिन्दू धर्म की हंसी उड़ाना भी ईसाई पादरियों का नित्यकर्म बन गया था। बालक राधाकृष्णन को यह बुरा तो लगता था पर धर्म के रहस्यों से अनजान होने के कारण वे अधिक बोल नहीं सकते थे। फिर भी इन बातों से उनका मन धर्म के स्वरूप की तरफ आकर्षित हो गया और वे इस विषय की पुस्तकों को पढक़र उन पर विचार करने लगे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की पुस्तकें पढ़ीं और उनसे उनको निश्चय हो गया कि हिन्दू धर्म ईसाई धर्म की अपेक्षा अधिक सारयुक्त और उपयुक्त है। अब वे ईसाई पादरियों की बातें सुनकर चुप नहीं रहते थे, वरन् कभी-कभी अपना असंतोष भी प्रकट कर देते थे।

वे ईसाई धर्म की निंदा नहीं करते थे, वरन् पादरियों की द्वेषदर्शी मनोवृत्ति की ही आलोचना करते थे। जब कोई पादरी उनके सामने हिन्दू धर्म की निंदा करता तो वे कहने लगते-'पादरी महोदय! आपका धर्म दूसरे धर्मों की निंदा करना ही सिखाता है क्‍या?'

पादरी उत्तर देते- 'और हिन्दू धर्म? क्‍या दूसरों की प्रशंसा करता है? 'हां, वह कभी दूसरों के धर्म को बुरा नहीं कहता। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने यही कहा है कि किसी भी देव की उपासना करने से मेरी ही उपासना होती है और मैं उसका प्रतिफल देता हूं। ये विभिन्न मजहब और सम्‍प्रदाय उन अनेकरास्तों की तरह हैं जो विभिन्न दिशाओं से आकर एक ही केन्द्र पर मिल जाते हैं। इनमें से किसी को सच्चा और अन्यों को झूठा कहना उचित नहीं।'

जब कभी कोई पादरी हिन्दू रीति-रिवाजों की आलोचना करता तो वे कहते-

'पादरी साहब! हो सकता है आप हमारे इन रीति-रिवाजों का महत्व न समझें, किन्तु चिरकाल से चली आ रही इन्हीं प्रथाओं ने हमारे विश्वास और श्रद्धा को स्थिर रखा है, जो धर्म का मूल है। मेरे देश का एक साधारण किसान भी, जो इन्हीं विश्वासों के साथ अपना जीवनयापन करता है, आज के विज्ञान की चकाचौंध से पागल बने किसी भी पाश्चात्य देश के अपने को ज्ञान सम्‍पन्न कहने वाले व्यक्ति से अधिकधार्मिक है। अधकचरे विज्ञान ने तो आज करोड़ों पाश्चात्यजनों की श्रद्धा को ऐसा निर्बल बना दिया है कि वे किसी भी धर्म के विश्वासी और अनुयायी नहीं रह पाते। इस प्रकार धर्म बल से रहित व्यक्ति क्‍या कभी सच्चा सुख पा सकता है? आप निश्चय समझ लें कि भारतवर्ष के जिन तपस्वियों और आचार्यों ने संसार को ऐसी महान संस्कृति दी और उसका लाभ बिना धर्म और सम्‍प्रदाय के भेदभाव के मानव मात्र को पहुंचाया, उनको कभी धर्म शून्य नहीं कहा जा सकता?' (क्रमश:)

Friday, November 18, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (15)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (15)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 15-11-2011

महान राष्ट्रवादी चिन्तक और विचारक वीर सावरकर ने क्‍या कहा था, इस पर विचार करना जरूरी है, उनकी कही बातें एक-एक करके सच हो रही हैं।

4 जून 1947 को वीर सावरकर ने कहा कि नेहरू का यह कथन गलत सिद्ध होगा कि भारत विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का सदा के लिए समाधान हो जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समाधान के रूप में देश को खंड-खंड करने वालों को मैं चेतावनी देता हूं कि देश के बंटवारे से यह समस्या सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझ जाएगी, क्‍योंकि यह प्रश्र दो जातियों का नहीं है। पाकिस्तान की स्थापना होते ही समस्या बढ़ेगी। अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से बोलते हुए वीर सावरकर ने 1937 में कहा था कि हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वंदेमातरम का विरोध कर रहे हैं कल हिन्दुस्तान और भारत नामों पर एतराज करेंगे। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को दारूल इस्लाम बनाना है। तुष्टीकरण की नीति से उनकी भूख और बढ़ती जाएगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना पड़ेगा। 7 अक्तूबर, 1944 को अखंड भारत सम्‍मेलन में वीर जी ने कहा था कि ''भारत को खंडित करके पाकिस्तान बनाने की मांग करके मुस्लिम लीग ने समस्त हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती दी है। कांग्रेसी नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की आत्मघाती नीति के कारण देश को खंड-खंड, अंग-भंग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। देश के प्रत्येक हिन्दू को अपने राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए सर्वस्व होम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

यदि उस समय वीर सावरकर की बात मानी जाती तो देश के बंटवारे का दु:ख नहीं भोगना पड़ता, परंतु कांग्रेस और गांधी जी की तुष्टीकरण की क्रियाओं ने हिन्दुओं के स्वाभिमान को समाप्त कर दिया। इस कार्य में गांधी जी के बाद में गीता पहले कुरान पढऩा ईश्वर, अल्ला तेरो नाम गाने से हिन्दुओं की मानसिक दृढ़ता निर्बल हुई और पाकिस्तान बन गया। जो वीर सावरकर ने कहा था अक्षरश: सत्य सिद्ध हुआ। बंटवारे से समस्या कम न होकर और बढ़ गई। आज फिर तुष्टीकरण का वही खेल गांधी की कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में खेल रही है। यदि वीर सावरकर की कही हुई बात हम आज भी मान लें तो भारत भावी दुर्दशा से बच सकता है। अब तो पाकिस्तान के आतंकी और भारत में छुपे हुए पाक-बंगलादेशी घुसपैठिए, अमरीका की नीति और कांग्रेस का तुष्टीकरण ये चार प्रकार के संकट देश पर आते हुए स्पष्ट दिख रहे हैं। इसमें धरती, आकाश, पहाड़, नदियां तो वहीं रहेंगी पर हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के अस्तित्व, स्वत्व और स्वाभिमान को खतरा बढ़ता जाएगा। वीर सावरकर का विरोध आजादी के बाद भी हुआ। जीते जी उनसे अन्याय किया गया और मृत्यु के बाद अपमान।

विडम्‍बना देखिए भरी जवानी में काला पानी भोगते हुए वीर सावरकर ने अखंड हिन्दू राष्ट्र की आजादी के लिए कोल्हू चलाया, उसी काले पानी के कीर्ति स्तम्‍भ से कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर ने वीर सावरकर के यशोगान का पत्थर हटवाकर उन महात्मा गांधी का पत्थर लगा दिया जिन्होंने वहां कभी दस मिनट चरखा भी नहीं चलाया।

यह एक स्वतंत्रता सेनानी का घोर अपमान है। केंद्र सरकार को चाहिए तो यह था कि नोटों पर वीर सावरकर का काले पानी में कोल्हू चलाते हुए का चित्र छापती, वीर सावरकर के नाम पर वहां मैडिकल कालेज, मुम्‍बई में विश्वविद्यालय बनवाती, वीर सावरकर एक्‍सप्रैस गाड़ी चलाती तथा पाठ्यक्रमों में वीर सावरकर का साहित्य पढ़ाती। आज देश चाहता है कि हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान के भविष्य की रक्षा के लिए वीर सावरकर के विचारों को पुन: जीवित करके आगे बढ़ें तथा तुष्टीकरण के अंधेरे को दूर करके स्वाभिमान का वीर सावरकर रूपी सूर्य उदय हो।

मेरा निश्चित मत है कि वीर जी के मार्ग पर चल कर ही हम भारत के भविष्य को बचा सकते हैं। 1947 की गलतियों का प्रायश्चित करने का समय आ गया है। सावरकर जी की भी यह प्रबल इच्छा थी। (क्रमश:)

Thursday, November 17, 2011

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (14)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? (14)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 14-11-2011

भारत में हिन्दू धर्म का बार-बार अपमान किया गया। हिन्दुओं के धर्मस्थलों का सरकारीकरण किया गया। कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार ने हिन्दुओं के आस्था स्थलों पर आघात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिन्दुओं के आराध्य देव श्रीराम द्वारा बनाए गए समुद्री सेतु श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ही नकार दिया। जब इसके विरोध में जनमानस उमड़ा तो सरकार थर-थर कांपने लगी। जब अलगाववादियों और आतंकवादियों के दबाव में आकर जम्‍मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने बाबा अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए दी गई भूमि वापस ले ली तो हिन्दू समाज ने एकजुट होकर विरोध किया। इस आंदोलन में 11 हिन्दू शहीद हुए और एक हजार से अधिक लोग घायल हुए। स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान देने वाले वीर सावरकर को आजादी के बाद भी कांग्रेस ने निशाना बनाया और मौत के बाद भी उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

वीर सावरकर ने कहा था कि राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण करो-यह अखंड भारत की सुरक्षा का महामंत्र क्रांतिकारियों के पथ प्रदर्शक महान देशभक्त वीर सावरकर ने भारत संतानों को देते हुए 1955 में जोधपुर में हिन्दू महासभा के मंच से बोलते हुए कहा था- ''जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जाएगा तब तक भारत की स्वाधीनता,उसकी सीमाएं, उसकी सभ्‍यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है कि वे अधिक संख्‍या में सेना में भर्ती होकर सैन्य विद्या प्राप्त करें ताकि समय पडऩे पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योगदान दे सकें। विद्यालयों में सैनिक शिक्षा अनिवार्य रूप में दी जाए।''

मुझे लगता है कि आने वाले 20 वर्षों के भीतर हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान पर घोर संकट आने वाला है। भारत विभाजन जिन कारणों से हुआ था उसमें यूरोप के ईसाई देशों ब्रिटेन-अमरीका आदि का कुटिल खेल चल रहा था। कांग्रेस सत्ता प्राप्ति के लिए इतनी लालायित थी कि हिन्दू हितों के विरुद्ध जाकर भी मुस्लिम लीग और जिन्ना के साथ मिलकर देश और सत्ता का बंटवारा स्वीकार कर लिया। मुसलमानों को पाकिस्तान नाम का मुस्लिम देश मिल गया और जो बचा वह हिन्दुस्तान यानी हिन्दुओं का स्थान कहलाया। देश विभाजित होते ही मुसलमानों को भारत की देवभूमि पर एक इस्लामी राष्ट्र मिल गया पर हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर देश का बंटवारा होने के बाद भी हिन्दुओं को उनका हिन्दू राष्ट्र एक दिन भी नहीं मिला। महात्मा गांधी ने जिन्ना मेरा भाई का राग अलापते हुए बड़े जोर-शोर से हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा लगाया और प्रार्थना सभाओं में ईश्वर अल्ला तेरो नाम खूब गाया, लेकिन गांधी जी के सामने ही भाईचारे का वह नारा फेल हो गया। जिन्ना और सुहरावर्दी के डायरेक्‍ट एक्‍शन से लहुलुहान भारत का बंटवारा हो गया। खून से लथपथ अंग-भंग भारत माता के शरीर पर कांग्रेसी दिल्ली में ढोल बजाकर सत्ता प्राप्ति का जश्न मना रहे थे और बंटवारे के दिन को आजादी का दिन बता रहे हैं।

कांग्रेसी नेताओं गांधी-नेहरू के तुष्टीकरण के आदर्शों पर वर्तमान कांग्रेस चल रही है और कांग्रेसी प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। यह स्पष्टत: हिन्दू हितों की बलि देने की घोषणा ही है। इस वाक्‍य से हिन्दू युवकों का भविष्य दाव पर लग गया है। सच्चर समिति को लागू करके मुस्लिम तुष्टीकरण का नंगा नाच कांग्रेस ने शुरू कर दिया है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों के प्रति जो कार्यवाही इस देश की हिन्दू जनता चाहती है उतनी नहीं हो रही अपितु देश पर हमला करने वाले आतंकवादियों की सुरक्षा पर उन्हीं सुरक्षा बलों को लगाया हुआ है जिन्हें वे मारने आते हैं। आतंकवादियों की सुरक्षा और खाने-पीने पर भी देश की गरीब जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। करोड़ों नहीं एक अरब से अधिक रुपए भारत में पकड़े गए आतंकियों पर खर्च किए जा चुके हैं। जो सेना कश्मीर में भारत की सुरक्षा में लगी हुई है उसे सीमा से वापस बुला रहे हैं।

पाकिस्तान और बंगलादेश से हथियार और विचार लेकर भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त आतंकवादियों से नरमी बरती जा रही है। स्थितियां बंटवारे से पहले की तरह भयावह हो रही हैं। पर कोई बोलता नहीं और जो बोलता है उसे साम्‍प्रदायिक और भाईचारा बिगाडऩे वाला बताकर उसके पीछे हाथ धोकर मानवाधिकारियों की फौज साथ लेकर पीछे पड़ जाते हैं। (क्रमश:)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? भाग- (13)

क्‍या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है?(13)

अश्‍वनी कुमार, सम्‍पादक (पंजाब केसरी)

दिनांक- 13-11-2011

राजनीति की क्‍या परिभाषा होनी चाहिए, आज की परिस्थितियों को देखकर समझना मुश्किल नहीं। राजनीति मानवता से अलग ऐसे लोगों की भीड़ की बकवास है, जिन्हें अपने गिरेबां में झांकने में कोई दिलचस्पी नहीं परन्तु दूसरों के सद्गुण भी उन्हें 'जहर' लगते हैं, अत: यह शाश्वत दुष्टता का ही पर्याय है जबकि धर्म का मतलब है- धारण करने योग्य। क्षमा, करुणा, दया, परहित, ये सब धारण करने योग्य हैं। अत: जो इन्हें धारण करता है वह धार्मिक है। ऐसे में राजनीति क्‍या धर्म के साथ रह सकती है?

· राजनीति सड़े हुए लोगों की दुर्गंध है?

· धर्म स्थित प्रज्ञ महापुरुषों की सुगंध है।

अत: राजनीति और धर्म का क्‍या मेल? लेकिन एक तीसरी श्रेणी भी है, बाहरी वेशभूषा में एकधार्मिक व्यक्ति लग रहा है, परन्तु भीतर ही भीतर जिसके हृदय में राजनीति ही अठखेलियां करती है, मैं ऐसे लोगों को धार्मिक श्रेणी में नहीं रखता। वे निकृष्टतम हैं, ये रंगे सियार हैं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ नीति मर्मज्ञ कौटिल्य ने जब राष्ट्र की कल्पना की तो उसमें राजनीति शब्‍द कहीं नहीं था। आप सारा अर्थशास्त्र देख लें। आप को राजधर्म शब्‍द मिल जाएगा, आपको दंड नीति मिल जाएगी, राजनीति नहीं मिलेगी।

भगवान श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरुष ने भी यह कभी नहीं कहा- मैं हर युग में 'राजनीति' की स्थापना करने आता हूं। वह कहते हैं- मैं धर्म की स्थापना और दुष्टों का नाश करने के लिए आता हूं। जिस दिन राष्ट्र ने भगवान कृष्ण के वचनों का मर्म समझ लिया, धर्म की स्थापना हो जाएगी और स्वत: ही हो जाएगा दुष्टों का नाश भी।

भगवान के वचन हैं, 'विनाशाय च दुष्कृताम' इसलिए आज का नेता धर्म से घबराया हुआ है। खास तो हैं ये कांग्रेस के नेता और उनके दुमछल्ले। उन्हें पता है जिस दिन राष्ट्र 'धर्म प्राण' हुआ, राजनेता समाप्त हो जाएगा और उसे ऐसी जगह दफना दिया जाएगा, जहां से वह कभी निकल कर नहीं आ सके। इसी डर से उसने एक शब्‍द गढ़ लिया- धर्मनिरपेक्षता। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ आप स्वयं जान लें- जो सारे मानवीय गुणों से विमुख हो, उसी को धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। उसके पास मानवीय गुणों को धारण करने की शक्ति नहीं लेकिन उसने अपना एक नया धर्म बना लिया है जो धर्मनिरपेक्ष है, उसकी नजर में धर्म क्‍या है, उसे देखें तो आप चमत्कृत हो जाएंगे।

पुराणों के अनुसार ऐसे लोग साधारण नहीं होते। या तो ये ब्रह्मज्ञानी होते हैं या परले दर्जे के मक्कार। आम जनता के लिए राजनेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं, अपशब्‍द बोलते हैं, निंदा करते हैं और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। कारण एक ही है- उस हमाम की सदस्यता प्राप्त करना जहां प्रवेश करने पर राष्ट्रद्रोह भी क्षम्‍य है। आप अपराधी हों, तस्कर हों, घोटालेबाज हों, बदमाश हों, उससे कुछ फर्कनहीं पड़ता। पिछले 64 वर्षों से यही तमाशा जारी है। सारे देश के संवेदनशील लोग घबरा गए हैं। जरा इन आवाजों को सुनिये-

तस्कर, बिल्डर माफिया, लूट, अपहरण, क्‍लेश

हाय! दलालों में बिका गांधी तेरा देश।

सर्कस में लंगूर ने गजब दिखलाया खेल

रेल घोटालों की चला, ब्रेक कर दिया फेल।

मंत्री पद की शपथ ले, वो बोल मुस्काय

साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम्‍ब समाय।

आप जिसे चाहें वोट दें, जिसका चाहे साथ दें, चरित्र यही है। ऐसे में श्रीराम का नाम भी दिल में ही लें तो अच्छा है। न जाने कौन साम्‍प्रदायिकता का आरोप लगाकर आपको दूर भगा दे। (क्रमश:)

यह आम भारतीय की आवाज है यानी हमारी आवाज...