Saturday, May 28, 2011

मत भूलो क्रांतिवीरों को

मत भूलो क्रांतिवीरों को


वीर स्वातंत्र्य सावरकर जयंती 27 मई


जो जाति अपने अतित को भूल जाती है, उसका विनाश निश्चित है। और वर्तमान परिवेश में हिन्‍दुओं की स्थिति देखकर यही प्रतीत होता है कि ये अपने अतीत को भूलकर विनाश की तरफ अग्रसर हो रही है। अपने अतीत के किसी भी प्रसंग पर गौरवान्वित होना तो दूर उल्‍टे ये उसे उपहास का विषय मानकर उसकी घोर निंदा और घृणा करने लगे हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है कि अब ये हिन्‍दू और ये हिन्‍दुस्‍तान अपने नष्‍ट होने के कगार पर पहुंच रहा है। आज किसी नौजवान से पूछा तो उसका आदर्श कौन है तो वह सलमान, शाहरूख और सचिन को बताएगा कोई पूछे जरा इनसे की इन लोगों ने कौन सा महानता का कार्य किया जिससे हमारे देश का कुछ भला हुआ हो। खैर समय ही ऐसा आ गया है किसी को नसीहत भी नहीं दे सकते। क्‍योंकि किसीको इसकी जरूरत ही नहीं है सब आजकल बहुत समझदार हैं। निम्‍नलिखित पंजाब केसरी की संपादकी आज के समय में बहुत प्रासंगिक है आशा है आप लोगों को भी इसे पढ़कर कुछ प्रेरणा मिलेगी:-


''पूछेगा इतिहास] समझ लो दिल्ली वालो

क्लीब बने, मुंह आज ढांप कर सोने वालो

कर न सकेगी क्षमा, तुम्हें पीढ़ी आगामी

मिट न सकेगा दाग, नपुंसकता अनुगामी।^^

आज वीर सावरकर की जयंती है। बर्गर और पिज्जा खाने वाली नई पीढ़ी शायद ही वीर सावरकर के बारे में जानती हो। दूरदर्शन या अन्य टीवी चौनल भूल कर भी उनके नाम या उनकी महत्ता का बखान नहीं करते। इसके लिए व्यवस्था जितनी दोषी है उतने ही हम भी हैं। हमने अपने बच्चों को वीर सावरकर के बारे में कभी बताने का प्रयास ही नहीं किया। आज कुछ लोग वीर सावरकर के चित्र पर माल्यार्पण कर इतिश्री कर लेंगे या हिन्दू महासभा में पदों के लिए एक-दूसरे से भिड़ रहे लोग उन्हें रस्मी तौर पर याद कर लें लेकिन यह इस राष्ट्र की विडम्बना है कि जिन लोगों ने सब सुविधाओं के साथ विशेष श्रेणियों में जेल यात्राएं कीं वे विश्व प्रसिद्ध नेता बन गए। परन्तु जिन्होंने अंडमान जेल की काल कोठरियों में अमानुषिक अत्याचार सहे, बैलों की जगह जुत कर कोल्हू चलाए वे राष्ट्र विरोधी और साम्प्रदायिक कहलाए। वीर सावरकर ब्रिटिश की मांद में जा धमके, उससे निर्भीकता से जा भिड़े, जिनके आग्नेय प्रवाह से परिपूर्ण भाषणों से अंग्रेज भयभीत हुआ उस सावरकर को ब्रिटिश सत्ता भक्त साबित करने और चरित्र हनन करने में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदारों और बुद्धिजीवियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इतिहास साक्षी है कि अंडमान की काल कोठरी में यम-यातनाएं झेलने वाले इस महामानव की काया भले ही जर्जर हो गई हो उनके दृढ़ संकल्प पर कोई आंच नहीं आई थी।

देशभक्त क्रांतिकारियों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 में जो सशस्त्र क्रांति की थी उसे अंग्रेजों ने गदर बताकर देशभक्त भारतीयों को भ्रमित करने की जो कुचेष्ठा की थी उसी भ्रम को तोडऩे के लिए वीर विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटेन में बैठकर 1857 का स्वतंत्रता संग्राम नाम का क्रांतिग्रंथ लिखा जिससे डरे हुए अंग्रेज ने छपने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। वीर सावरकर ने यह ग्रंथ 1907 में लिखा था। प्रतिबंध के बाद भी इसका अंग्रेजी अनुवाद हालैंड में छपा वहां से फ्रांस और भारत में भेजा गया। क्रांतिकारियों ने इसे गीता की तरह पढ़ा। इसका दूसरा संस्करण भीकाजी कामा, लाला हरदयाल आदि क्रांति वीरों ने छपवाया। तीसरा संस्करण सरदार भगत सिंह ने गुप्त रूप में छपवाया। यह ग्रंथ इतना लोकप्रिय था कि इसकी एक-एक प्रति तीन-तीन सौ रुपए में बिकी।

13 मार्च, 1910 को लंदन में विक्टोरिया स्टेशन पर वीर सावरकर को बंदी बना लिया गया। उनके बड़े भाई गणेश सावरकर को 1908 में देशभक्ति की कविता लिखने के कारण 9 जून, 1909 को आजीवन कारावास की सजा देकर काला पानी भेजा गया। छोटे भाई नारायण सावरकर को क्रांतिकारियों का साथी बताकर जेल में बंद कर दिया। जब इस घटना का जेल में बंद वीर सावरकर को पता लगा तब गर्व से बोले, ''इससे बड़ी गौरव की क्या बात होगी हम तीनों भाई भारत माता की आजादी के लिए तत्पर हैं।''

1 जुलाई, 1910 को ब्रिटेन से भारत लाने के लिए वीर सावरकर को समुद्री जहाज से कठोर पहरे के बीच अंग्रेज पुलिस लेकर चल पड़ी। 8 जुलाई, 1910 को वीर सावरकर स्वतंत्र भारत की जय बोल कर समुद्र में कूद पड़े। अंग्रेजों ने खूब गोलियां चलाईं पर निर्भय सावरकर फ्रांस की सीमा में पहुंच गए। फ्रांस की भूमि से सावरकर को गिरफ्तार किया तो इसका विरोध हुआ तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में केस चला पर फ्रांस और ब्रिटेन की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला। 30 जनवरी, 1911 को वीर जी को दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई तब वे हंस कर बोले चलो ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया।

उन्होंने भारत को हिन्द शब्द की परिभाषा दी। वीर सावरकर का सारा जीवन हिन्दुत्व को समर्पित था। अपनी पुस्तक हिन्दुत्व में हिन्दू कौन है? इसकी परिभाषा में यह श्लोक लिखा-

''आसिन्धु सिन्धुपर्यन्तायस्य भारतभूमिका।

पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।''

अर्थात् भारत भूमि के तीनों ओर के सिन्धुओं (समुद्रों) से लेकर हिमालय के शिखर से जहां से सिंधु नदी निकलती है वहां तक की भूमि जो पितृ (पूर्वजों) की भूमि है यानी जिनके पूर्वज भी इसी भूमि में पैदा हुए और जिसकी पुण्य भूमि यानी तीर्थ स्थान इसी भूमि में हैं वही हिन्दू होता है।

आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास में यथोचित स्थान ही नहीं दिया। स्वतंत्रता संग्राम में केवल गांधी और गांधीवादियों की ही भूमिका का विस्तृत उल्लेख किया। पंडित नेहरू तो इनसे इतने भयभीत थे कि देश का हिन्दू सावरकर को ही अपना नेता मान बैठेगा। गांधी जी की हत्या के मामले में नेहरू सरकार ने झूठे आरोप लगाकर उन्हें लालकिले में बंद कर दिया। बाद में न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया था।

वीर सावरकर के महाप्रयाण के बाद भी अटल सरकार के दौरान कांग्रेस ने संसद भवन में उनका चित्र लगाने पर विवाद खड़ा कर दिया था और 2001 में यूपीए सरकार के रहते मणिशंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गांधी के नाम का पत्थर लगा दिया था, जबकि गांधी वहां कभी गए ही नहीं थे। मेरे इस सम्पादकीय का प्रयोजन गांधी-नेहरू की आलोचना करना नहीं। उन्होंने अपने प्रकार से देश सेवा का ही उपक्रम किया है, लेकिन मेरी कलम यही कह रही है कि आजादी केवल गांधीवादियों की देन नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदानों के चलते ही मिली है। राष्ट्र सभी को समान सम्मान दे। कांग्रेस ने बहुत से कुटिल खेल खेले हैं, आज राष्ट्र को वीर सावरकर जैसे नेता की जरूरत है। अगर आज हमने बच्चों को वीर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों को इतिहास नहीं पढ़ाया तो भविष्य में कोई भी क्रांतिवीर नहीं होंगे।

स्रोत:- संपादकीय पंजाब केसरी

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